
माँ-बाप ज़िंदगी के वो अनमोल ख़ज़ाने हैं,
बिछड़ जाएँ एक बार तो दोबारा नहीं मिलते।

उम्र भर जहाँ में रिश्ते नए हम बनाते हैं,
पर खो जाएँ जो अपने, तो फिर नहीं मिलते।
गोद में सिमटकर,हर डर पिघल सा जाता था,
वो साए जो रूठ जाएँ ,तो घर नहीं मिलते।
कितने ही दिन गँवाते हैं,हम दौलतों के पीछे
पर वक़्त लौट आए ऐसे सफ़र नहीं मिलते।
जो रात भर दुआओं में नाम ले के रोते थे,
वो हाथ छूट जाएँ तो असर नहीं मिलते।
कंधों पे बिठाकर जिसने दुनिया दिखाई थी,
झुक जाएँ जो कंधे,वो फिर नहीं मिलते।
सोच कर ही आँखें,अक्सर भीग जाती हैं
माँ-बाप ज़िंदगी में दोबारा नहीं मिलते।।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




