
धर्म, अध्यात्म और योग-साधना के क्षेत्र में सिद्धि और प्रसिद्धि का बड़ा गड़बड़झाला मौजूद है। जिनके पास प्रसिद्धि होती है, उनके पास सिद्धि नहीं होती। और जिनके पास सिद्धि होती है, उनके पास प्रसिद्धि नहीं पाई जाती है।सिद्धि से रहित लोग ही प्रसिद्धि पाने के चक्कर में पड़ते हैं जबकि जिनके पास सिद्धि होती है,वो इसे छिपाकर रखते हैं।वो सरेआम इनका प्रदर्शन नहीं करते हैं।वो चुपचाप अपना कर्तव्य कर्म करने में लगे रहते हैं। आजकल प्रसिद्धि प्राप्त करने वालों की भीड़-भाड़ बढ गई है, जबकि सिद्धि प्राप्त लोगों का अकाल सा पड़ा हुआ लगता है। जहां देखो वहीं पर प्रसिद्धि प्राप्त या फिर प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिये पागल लोगों की भीड़-भाड़ ही देखने को मिल रही है। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र का कोई हित न करके अपना स्वयं का हित साधने में लगे रहते हैं।
उज्जयिनी के राजा सुधन्वा और उनकी धर्मपत्नी वैदिकधर्मी थे। लेकिन इसके साथ साथ दोनों बौद्ध और जैन मत के आचार्यों का भी सम्मान करते थे। इनके साथ -साथ शास्त्रार्थ महारथी कुमारिलभट्ट अपने शास्त्रीय ज्ञान के बल पर दार्शनिक रुप से सशक्त भूमिका तैयार कर रहे थे। वो विभिन्न मतावलंबियों से शास्त्रार्थ करके वैदिक धर्म और संस्कृति को सशक्त बनाने के लिये दिन रात बौद्धिक परिश्रम कर रहे थे।और फिर पदार्पण हुआ आदि शंकराचार्य का। उस समय यदि बौद्ध,जैन,कापालिक, चार्वाक आदि विभिन्न मतों में एकतरफा कामुक उच्छृंखलता और उन्मुक्त भोग की लालसा नहीं आती तो कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र और शंकराचार्य आदि वैदिक धर्मी दार्शनिकों को समस्त भारत में दिग्विजय यात्राएं नहीं करनी पडतीं।इन तीनों दार्शनिकों के लिये इनके गुरुओं गौडपाद,गोविंदपाद आदि ने मीमांसा,वैशेषिक,न्याय, सांख्य,योग और वेदांत आदि षड्दर्शनशास्त्र के माध्यम से पहले ही एक शुरुआत कर रखी थी। इससे इन तीनों को वैदिक धर्म और संस्कृति के रक्षणार्थ दिग्विजय करने में काफी सुविधा रही।यह ध्यान रहे कि इन सभी वैदिक धर्मी दार्शनिकों को नारी शक्ति का भी भरपूर सहयोग मिला था। मंडन मिश्र की धर्मपत्नी भारती और राजा सुधन्वा की धर्मपत्नी के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता है।इसके लिये ‘शंकर दिग्विजय’ ग्रंथ का स्वाध्याय करना सही रहेगा।उस समय यानी आज से 2600 वर्षों पहले यदि बौद्ध, जैन, चार्वाक,आजीवक आदि मतों में पाखंड, ढोंग, उन्मुक्त भोग और उच्छृंखल जीवन-शैली व्याप्त नहीं होती तो गौडपाद,गोविंदपाद, मंडन मिश्र,कुमारिलभट्ट, शंकराचार्य आदि को दिग्विजय यात्राएं करके शास्त्रार्थ करने की आवश्यकता ही नहीं होती। पाश्चात्य लेखकों के पूर्वाग्रह से सराबोर साहित्य के साथ -साथ वैदिक धर्म और संस्कृति के साहित्य का स्वाध्याय अवश्य किया जाना चाहिये। आजादी के पश्चात् भारत के शासनतंत्र में व्याप्त वैदिक धर्म और संस्कृति के प्रति वर्तमान अकर्मण्यता और राजनीति में विभिन्न अवैदिक मतों की अवैध घुसपैठ के कारण बहुत हानि हो रही है।
युनानी फिलासफर अरस्तू ‘सिकंदर द समाल’ के गुरु बतलाये जाते हैं।फिलीप द्वितीय ने अरस्तू को सिकंदर की शिक्षा दीक्षा के लिये नियुक्त किया था।मकदुनिया में कयी वर्ष तक अरस्तू ने सिकंदर को राजनीति, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि की शिक्षा प्रदान करके सिकंदर के व्यक्तित्व का निर्माण किया था।वह व्यक्तित्व था दूसरे देशों पर बेवजह आक्रमण करके वहां पर लूटपाट करना,उन देशों पर कब्जा करना, नरसंहार करना, महिलाओं की इज्जत आबरू को तार तार करना आदि आदि। अरस्तू से लगभग 1500 वर्षों पहले भारत में मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य हुये थे। उन्होंने तो चंद्रगुप्त मौर्य का व्यक्तित्व ऐसा तैयार नहीं किया था कि वो दूसरे देशों पर आक्रमण करके वहां लूटपाट करें, नरसंहार करें,शासन कायम करें तथा महिलाओं से दुर्व्यवहार करें। ध्यान रहे इन सिकंदर ने भारत की सीमा पर आक्रमण चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में किया था, चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में नहीं। दोनों चंद्रगुप्त के कालखंड में गड़बड़झाला करने का कुकृत्य पाश्चात्य लेखकों का भारतीय इतिहास लेखन को विकृत करने के निमित्त था। क्यों, ताकि युनानी इतिहास को भारतीय इतिहास के समकक्ष या भारतीय इतिहास से पुरातन सिद्ध किया जा सके। दर्शनशास्त्र के इतिहास में समस्त संसार में भारत और युनान को वैचारिक स्वतन्त्रता की भूमि कहा जाता है। लेकिन इसमें भी सच्चाई नहीं है। यदि युनान में वैचारिक स्वतन्त्रता होती तो सुकरात को जहर देकर मारा नहीं जाता। प्लेटो का युनानी राजनीति में हस्तक्षेप था, इसलिये वो प्रताड़ना से बच गये, अन्यथा उनको भी मार दिया जाता।जहा तक अरस्तू की बात है,उनको भी वैचारिक स्वतन्त्रता दिखलाने के अपराध में युनान को छोडने पर विवश होना पड़ा था, अन्यथा उनको भी मार दिया जाता। अरस्तू ने बीस वर्षों तक अपने गुरु प्लेटो की अकादमी में शिक्षा ग्रहण की थी।बाद में उसी अकादमी में वो शिक्षक भी रहे। प्लेटो के देहावसान के पश्चात् अरस्तू ने अपनी स्वयं की अकादमी ‘लाईसियम’ स्थापित की। ज्यों ही उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतन्त्रता का प्रयोग करना शुरू किया, त्यों ही वहां के शासक उनसे नाराज़ हो गये। उनके शिष्य सिकन्दर के देहावसान के पश्चात् मैसेडोनिया विरोधी लहर चल पड़ी।मैसेडोनिया से संबंध होने के कारण अरस्तू पर भी वही अधार्मिकता और युवा पीढ़ी को दिग्भ्रमित करने के आरोप लगाये गये,जिन आरोपों के कारण सुकरात को जहर देकर मार डाला गया था। अरस्तू ने सुकरात वाली गलती नहीं दोहराई तथा मुकदमे का सामना करने की बजाय उन्होंने स्वेच्छा से निर्वासन स्वीकार कर लिया। और युनान की वैचारिक स्वतन्त्रता की धज्जियां उड़ाते हुये उन्होंने कहा कि मैं युनान को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध करने का अवसर नहीं दूंगा। वैचारिक स्वतन्त्रता का गला घोंटने वाली युनानी सत्ता से वाद विवाद करने की बजाय उन्होंने वहां से पलायन करना ही उचित समझा। वो एथेंस को छोड़कर चाल्सिस चले गये थे तथा अपने अपमान को सहन नहीं करने की पीड़ा के कारण वहीं पर एक वर्ष पश्चात् उनका देहावसान हो गया।
अपने गुरु सुकरात की मृत्यु से प्लेटो काफी आहत थे, इसलिये उन्होंने अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में शासन- प्रशासन के लिये लोकतंत्र को मूर्खों की राजनीतिक व्यवस्था कहकर उसका उपहास किया। इसके स्थान पर उन्होंने ‘दार्शनिक राजा’ की अवधारणा को प्रस्तुत किया, जिसमें न्याय, बुद्धि,साहस आदि सद्गुणों को प्रधान माना गया। लेकिन शीघ्र ही उनको अपनी भूल का अहसास हुआ तथा अपने गुरु की हत्या का प्रसंग आया। उन्होंने एकदम से पलटी मारी तथा जीवन के अंतिम दिनों में ‘दि लाज’ नामक पुस्तक लिखकर ‘दार्शनिक राजा’ की अवधारणा को तिलांजलि देकर ‘कानून के शासन’ की पैरवी की। यदि वो ऐसा नहीं करते तो वैचारिक स्वतन्त्रता की विरोधी और संकीर्ण विचारों की युनानी सत्ता द्वारा उनकी भी हत्या किया जाना निश्चित था। उन्होंने चालाकी से काम लिया और वो मृत्युदंड से बच गये। उनका जन्म कुलीन परिवार में हुआ था, इसलिये वो राजनीतिक शाजिसों से अवगत थे। एथेंस में ‘एकेडेमस’ युनानी पौराणिक नायक के उपवन में उन्होंने सर्वप्रथम अपनी दार्शनिक संस्था स्थापित की,इसीलिये उस संस्था का नाम ‘अकेडमी’ पड़ गया। उनके द्वारा लिखित संवादों में अधिकांशतः सुकरात के मुख से विभिन्न विचारों को कहलवाने का प्रयास किया गया है। सीधे -सीधे अपनी ओर से प्लेटो बहुत कम बोले हैं। उनके पैंतीस के आसपास संवादों में दस संवादों को तो किसी अन्य लेखक द्वारा लिखित माना जाता है। बाकी बचे संवादों में भी कितना हिस्सा प्लेटो का है तथा कितना अन्य लेखकों द्वारा डाला गया है,इसका मालूम नहीं है।बाद के लेखकों ने बहुत कुछ सामग्री प्लेटो के नाम से लिखकर प्रचारित कर दी है। प्लेटो के संवादों में इतनी मिलावट हो चुकी है कि शुद्ध रूप से प्लेटो द्वारा लिखित संवादों का निर्धारण करना बहुत कठिन कार्य है।
मूल लेखकों के ग्रंथों को हु-ब-हू उसी तरह से सुरक्षित रखने की कोई तरकीब युनानी लेखकों के पास मौजूद नहीं थी, ताकि सारे साहित्य को नहीं तो कुछ साहित्य तो मिलावट से सुरक्षित रहता।भारत में वेदों को सुरक्षित रखने के लिये संहितापाठ,मालापाठ,जटापाठ,घनपाठ आदि के रूप में एक अचूक विधि हजारों वर्षों से मौजूद रही है। इसके साथ दर्शनशास्त्र साहित्य को सुरक्षित रखने के लिये उसे सूत्ररूप में लिखा गया ताकि शिष्यों प्रशिष्यों द्वारा उन सूत्रों को आसानी से कंठस्थ सुरक्षित रखा जा सके।
भौतिकवादी और उन्मुक्त भोगवादी जीवन -शैली के कारण आज भारत सहित समस्त दुनिया की व्यवस्था ऐसी बन गई कि आज शायद वही व्यक्ति सुरक्षित है, जिसको कोई मारना नहीं चाहता है। अन्यथा यहां पर कोई भी सुरक्षित नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि विभिन्न सरकारें और उनकी सभी संस्थाएं 5-7 प्रतिशत आबादी की निजी सुरक्षा, उनके महलों की सुरक्षा,उनकी फैक्ट्रियों की सुरक्षा, उनके काफिलों की सुरक्षा तथा उनकी रैलियों की सुरक्षा में तैनात रहती हैं।90 प्रतिशत से अधिक आबादी बिल्कुल असुरक्षित भगवान् भरोसे जीवन यापन कर रही है।उस बहुसंख्यक आबादी का कोई रक्षक नहीं है। हालांकि वह 90 प्रतिशत आबादी सर्वाधिक टैक्स देती है, जिससे सरकार और सरकारी सिस्टम अय्याशी का जीवन जीते हैं।जिनकी सुरक्षा में अधिकांश पुलिस फोर्स और न्यायपालिका लगे रहते हैं,उसका खर्च अधिकांशतः 90 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी के टैक्स से किया जाता है। बैंक भी उस दस प्रतिशत आबादी को ही सस्ती दरों पर सर्वाधिक लोन वगैरह देते हैं। नब्बे प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी को लोन भी महंगी दरों पर मिलता है। और आश्चर्यजनक तो यह है कि वह दस प्रतिशत आबादी लोन को समय पर वापस नहीं करती हैं। अधिकांशतः उसका लोन माफ कर दिया जाता है। भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों में मेहनतकश आबादी को सबसे कम सुविधाएं मिलती हैं तथा निठल्ले, अपराधी, बलात्कारी,भ्रष्टाचारी, चालबाज लोगों को सर्वाधिक सुविधाएं मिलती हैं। आधुनिक लोकतंत्र का यह घिनौना चेहरा सबके सामने है। आधुनिक लोकतंत्र का यह घिनौना स्वरूप राजशाही,कुलीनशाही, तानाशाही,साम्यशाही,समाजशाही आदि सभी व्यवस्थाओं से अधिक घृणित,भेदभावपूर्ण,विषमतायुक्त और अत्याचारी है। मेहनत कोई करे, प्रतिभा किसी की लगे और अय्याशी करे कोई अन्य पक्ष।
उपभोक्ता बाजार में कोई तर्क मौजूद नहीं है।पूरा का पूरा उपभोक्ता बाजार धांधली, अंधविश्वास, दुष्प्रचार और धुआंधार प्रचार पर आधारित होकर चलता है।दूध,घी,मक्खन,तेल,रिफाइंड,डालडा,लस्सी,मावा, मिठाई,बर्गर,हाट डाग,मैगी,चिकन,मुर्गीदाना,चारा खल, बिस्कुट,टाफी, फलों के जूस,हैल्थ पावडर, एलोपैथिक दवाओं आदि आदि सब कुछ मिलावटी,नकली और हानिकारक।यह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अखिल वैश्विक मक्कडजाल है। अधिकांश देश इस मक्कडजाल में फंसे हुये हैं। युरोपीयन देश, चीन, अमरीका, आस्ट्रेलिया आदि धनी मानी देश हरेक प्रकार का कैमिकल युक्त कूडा- कर्कट दूसरे देशों के नागरिकों को खाने के लिये विवश कर रहे हैं। और अब तो उस कूड़े कर्कट में भी अनाज,फल, सब्जियों,सूखे मेवों,दूध और चारे के बीजों के साथ छेड़छाड़ करके उसे हजारों गुना जहरीला बनाकर बेच रहे हैं। अपने व्यापारिक हितों को सर्वोपरि रखते हुये किसी भी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर या टैरिफ आदि लगाकर जबरदस्ती से अपने सामान को बेचते हैं।इस्ट इंडिया कंपनी ने इसी तरह तो भारत को कंगाल बनाया था।अब फिर से अमरीका ने वही घटिया और लूटपाट का खेल शुरू कर दिया है।खनिज तेल भी अब इस धींगामुश्ती में शामिल हो गया है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता सामान खपाने का बाजार है।सबकी नजर भारत पर है। किसी देश का बिकाऊ सिस्टम इस धींगामुश्ती को सहन नहीं कर पाता है। सिस्टम की कमजोरी के कारण आज भारत का पचास करोड़ से अधिक संख्या वाला किसान परिवार अमरीका की कुदृष्टि के सामने असहाय नजर आ रहा है। अमरीका और यूरोपीय देशों का में कार्यरत बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बीज माफिया,दूध माफिया,तेल माफिया,दवा माफिया, खाद्यान्न माफिया, टैक्नोलॉजी माफिया, शिक्षा माफिया आदि किसी तर्क, न्याय, नैतिकता,मानवीयता और धार्मिकता को नहीं मानता है। उसके लिये अपना आर्थिक हित सर्वोपरि है। कमजोर,लचर और अयोग्य राजनीतिक सिस्टम इन माफियाओं के सामने हथियार डाल देता है। इस सिस्टम को फंडिंग करने वाले इनके मित्र अपने आर्थिक हित देखते हैं।पिसता है जनमानस। अन्यथा पिचहतर वर्षों के लंबे कालखंड में भारत जैसे किसी साधन-संपन्न राष्ट्र को विश्व महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक पाता।
पिछले दशकों में उपरोक्त माफियाओं ने भारतीय देशी घी,तेल,भोजन,दूध, आयुर्वेद चिकित्सा,दवाईयों और वस्त्राभूषण को स्वास्थ्य और सेहत के लिये हानिकारक प्रचारित करके डालडा, रिफाइंड,दूध पावडर, हैल्थ ड्रिंक को भारतीय उपभोक्ता बाजार में जबरदस्ती से फेंककर खरबों डालर कमा लिये हैं।अब फिर से वही होने वाला है।अब एक बार फिर से भारतीय गाय भैंस के दूध और दूध से बनी खाद्य सामग्री,चारे,खली,भूसे,तूडी, मुर्गीदाने,बीजों, नारियल पानी, खाद्य तेलों आदि को विभिन्न कृषि विशेषज्ञों,खाद्य विशेषज्ञों, मैडिकल रिसर्च जर्नल, डाक्टरों के द्वारा हानिकारक प्रचारित करवाकर खुद के सामान से भारतीय बाजारों को भर दिये जाने की तैयारी चल रही है। धन,दौलत और अपनी राजनीतिक आर्थिक प्रभुता कायम करने के लिये कुछ भी करना इनके लिये मामूली बात है।
मनुष्य को विज्ञान के साथ कला और मानविकी जैसे विषयों की भी आवश्यकता होती है।अकेला विज्ञान व्यक्ति को भौतिकता,जडता, उन्मुक्त भोग,बुद्धि, विचार, चिंतन आदि में उलझाकर तनावग्रस्त कर देता है।माना कि बुद्धि ने अनेक चमत्कारी कार्य किये हैं तथा अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान की हैं, लेकिन बुद्धि में ही निवास करते रहना व्यक्ति के जीवन को अशांति, अतृप्ति, असंतोष, अकेलेपन से भर देता है। इनमें फंसा हुआ व्यक्ति दूसरों को सताने, नीचा दिखाने,उनका शोषण करने,उनकी टांग खिंचाई करने तथा उनकी अपेक्षा अधिक भोग की सामग्री एकत्र करके बस इन्हीं में सुख, संतुष्टि, तृप्ति, शांति और जीवन की सफलता तलाश करने लगता है।इस बेवकूफी का कारण जहां कला और मानविकी जैसे संकायों के अंतर्गत दर्शनशास्त्र, योगाभ्यास, अध्यात्म, नीतिशास्त्र,संगीतशास्त्र, ललित कला जैसे विषयों की उपेक्षा जिम्मेदार है, वहीं पर विज्ञान के प्रति अंधभक्ति रखना भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण है।मन की शांति मन के तल पर न होकर मन से पार जाकर ही हो सकती है।मन से पार जाने का विज्ञान के पास कोई रास्ता या तकनीक या पथ नहीं है।
बताया जाता है कि आइंस्टीन से यह पूछने पर कि वो वायलिन क्यों बजाते हैं तो उन्होंने उत्तर दिया कि वायलिन के संगीत से मैं दोबारा से सरल,सहज और निर्भार हो जाता हूं।यह कला संकाय की महानता के प्रति आइंस्टीन के उद्गार हैं।इस धरती पर यदि विज्ञान के साथ कला और मानविकी जैसे संकायों को भी समान महत्व मिलता तो आज इस धरती का रुप कुछ अन्य ही होता। फिर इस धरती पर इतने युद्ध, लड़ाईयां, उलझाव, अपराध, लूटपाट, बलात्कार, शोषण, टांग खिंचाई, प्रतिस्पर्धा आदि नहीं होते। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिये विज्ञान को बढ़ावा दे रही हैं तथा कला और मानविकी के विषयों दर्शनशास्त्र,योग, अध्यात्म, नीति,तंत्र,ललित कला, संगीत आदि को समय और पैसे की बर्बादी कह रही हैं।पूरी धरती टार्चर कैंप बन चुकी है।
दर्शन,दर्शनशास्त्र और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। प्रसिद्ध विचारक हृदय नारायण दीक्षित के अनुसार दर्शन और दर्शनशास्त्र में उपलब्ध जानकारी व अनुभव के आधार पर प्रकृति के अज्ञात रहस्यों को जानने का प्रयास होता है।इस यात्रा में तर्क, प्रतितर्क और संशय उपकरण बनते हैं। ऋग्वेद विश्वदर्शन का प्रथम उद्भव है। ऋग्वेद के कवि सोचने की दार्शनिक दृष्टि के अग्रज हैं।उनकी कविता के जन्म का स्रोत प्रकृति है।वे प्रकृति के गोचर प्रपंचों को ध्यान से देखते हैं।इन प्रपंचों की गति व विधि के प्रति जिज्ञासु होते हैं।वे प्रत्यक्ष को स्वीकार करते हैं। लेकिन प्रत्यक्ष देखी जानकारी से संतुष्ट नहीं होते। ज्ञान के अनंत आयाम हैं।पंथिक, मजहबी या रिलीजियस समाज देवदूतों वाले ज्ञान को अंतिम मानते हैं
भारत में वैचारिक स्वतन्त्रता का ही कमाल है कि यहां पर ईश्वर के संबंध में भी प्रश्न उठते रहे हैं।अरब देशों में ईशनिंदा करने पर मौत की सजा का प्रावधान है।आज से 2300 वर्षों पहले युनान में ईशनिंदा के अपराध में सुकरात को जहर देकर मार दिया गया था। सुकरात पर यही आरोप था कि वो युनानी देवताओं को मान्यता नहीं देते। एथेंस नगर की न्यायपीठ ने 501 सदस्यों के सामने सुकरात ने स्पष्टीकरण दिये।220 सदस्यों ने उनको निर्दोष माना जबकि 281 सदस्यों ने दोषी ठहराया।उनको बहुमत से प्राणदंड दिया गया था। दर्शन, दर्शनशास्त्र, विचार, चिंतन और फिलासफी के लिये मौत की सजा देने की यह घटना युनान में घटित हुई थी,जिसे पाश्चात्य विचारक फिलासफी की भूमि मानते हैं। इतना बड़ा झूठ? लेकिन दूसरी तरफ भारत में ईश्वर,मोक्ष, पुनर्जन्म, कर्मफल और देवताओं पर प्रश्न उठाने की आस्तिक परंपरा ऋग्वेद के समय से वर्तमान है। ऋग्वेद का सूक्त 10/129 वास्तव में धरती पर मौजूद सभी दर्शनों, दर्शनशास्त्रों और फिलासफी का जन्मदाता है।
किसी व्हाइट्स एप समूह के एक मित्र समझा रहे थे कि तर्क और कुतर्क में मुख्य अंतर तथ्यों की प्रमाणिकता, उद्देश्य और तर्कसंगतता का है। तर्क सत्य की खोज में प्रमाणों के साथ दिया जाता है और समझ बढ़ाता है, जबकि कुतर्क बिना आधार के, अपनी बात जबरदस्ती मनवाने या भ्रम फैलाने के लिए किया जाता है। तर्क और कुतर्क में विस्तृत अंतर:
आधार : तर्क तथ्यों, साक्ष्यों और वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित होता है। वहीं, कुतर्क केवल दिखावटी ज्ञान, अज्ञानता या पूर्वाग्रह पर आधारित होता है।
उद्देश्य : तर्क का उद्देश्य सच तक पहुँचना होता है, जबकि कुतर्क का उद्देश्य सिर्फ जीतना, दूसरे को नीचा दिखाना या भ्रम पैदा करना होता है।
दृष्टिकोण : तर्क तटस्थ होता है और सुनने-समझने की क्षमता रखता है। कुतर्क कट्टरता को बढ़ावा देता है, इसमें सामने वाले का पक्ष सुनने के लिए तैयार नहीं होते।
परिणाम : तर्क समझ को बढ़ाता है और उचित समाधान देता है। कुतर्क से तर्कसंगतता नष्ट होती है और अज्ञानता बढ़ती है।
प्रकृति : तर्क प्रकाश की तरह साफ और स्पष्ट होता है, जबकि कुतर्क धुएं की तरह भ्रमित करता है।
उदाहरण:
तर्क: धूम्रपान से कैंसर हो सकता है, क्योंकि शोध बताते हैं कि तंबाकू में कार्सिनोजेन होते हैं।
कुतर्क: धूम्रपान से कैंसर नहीं होता, क्योंकि मेरे दादाजी रोज़ सिगरेट पीते थे और 90 साल तक जिए। (व्यक्तिगत अनुभव का सामान्यीकरण, जो तर्कहीन है)।
संक्षेप में: तर्क ज्ञान बढ़ाता है, कुतर्क अज्ञानता। जहाँ तर्क से सुलह की गुंजाइश होती है, वहीं कुतर्क में कट्टरता। सुकरात युनानियों को यही समझा रहे थे, लेकिन पांथिक और मजहबी कट्टरता के कारण युनानियों को सुकरात की बातें समझ नहीं आईं और उनको मौत के घाट उतार दिया।बाद में यही दुर्घटना अरस्तू के साथ हुई थी,जिसका जिक्र हो चुका है। सुकरात और अरस्तू के साथ -साथ पर्सियन, यहुदी, ईसाई और इस्लाम में ऐसी हजारों दर्दनाक दुर्घटनाएं 2000 वर्षों के कालखंड में घटित हो चुकी हैं। पूर्वाग्रहग्रस्त, भेदभावपूर्ण और हीनता सर्वोच्चता ग्रंथियों से ग्रस्त होने के कारण पाश्चात्य विचारक,लेखक और इतिहासकार इन घटनाओं को छिपाने का प्रयास करते आये हैं। वहां पर इतना सब अमानवीय कुकर्म,कुतर्क,छल, ढोंग, पाखंड आदि होने के बावजूद भी अपने आपको वैचारिक स्वतन्त्रता की भूमि कहकर प्रचारित करना दुनिया का सबसे बड़ा झूठ ही कहा जायेगा।
जनता प्रतिदिन और प्रतिवर्ष अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को प्रदान करती है।यह केवल इसलिये है कि जनता को शिक्षा, चिकित्सा, आवास, न्याय और सुरक्षा- ये पांच सुविधाएं सरकार की ओर से निशुल्क प्राप्त हो सकें।एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था का का यही गुण धर्म है। कोई सरकार यदि ऐसा करने में असमर्थ हो तो उसे निकम्मा, नाकारा और भ्रष्ट ही कहा जायेगा। लेकिन सरकारे अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिये प्रचार माध्यमों को खरीदकर अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने के लिये गलत प्रचार करने लगती हैं। जनता अपने साथ हो रहे भेदभाव, अत्याचार, ज़ुल्म और शोषण के विरोध में आवाज उठाये तो उसे देशद्रोही कहकर दबाया जाता है। विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया जाता है। झूठे मुकदमे दर्ज किये जाते हैं। होना तो यह चाहिये कि अपनी विफलताओं का निरीक्षण करके उन्हें दूर किया जाये लेकिन ऐसा बहुत कम हो पाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा नहीं होने के दावे किये जाते हैं लेकिन यह झूठ सिद्ध हो रहा है। समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था को नेता लोग अपने और अपने आर्थिक हितैषियों के लाभार्थियों के लिये इस्तेमाल करते है। विभिन्न धर्माचार्य भी भ्रष्ट व्यवस्था और नाकारा नेताओं की ढाल बनकर खड़े होने लगे हैं। अपने आर्थिक हित साधने के लिये लोकतंत्र का चौथा स्तंभ प्रेस भी सिस्टम की चापलूसी और जी हुजूरी में व्यस्त होने लगा है। संविधान ग़लत है या संविधान को लागू करने वाले ग़लत हैं या फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था ही ग़लत है – इस पर बहुत कम मंथन हो रहा है। बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग भी निष्पक्ष मंथन न करके अतिरिक्त सुविधाएं और वैभव विलास के मोह में भ्रष्ट और नाकारा सिस्टम की खुबियां गिनवाने में व्यस्त हो रहे हैं। कवियों और लेखकों की जमात तो मात्र मुकदर्शक बनकर तमाशा देखने में ही अपनी काव्य प्रतिभा और सफलता समझ रही है।इन पर यदि कोई टिप्पणी करे तो भिरड ततैयों की तरह उस पर टूट पड़ते हैं।पिस रही है मेहनतकश जनता -जनार्दन और बर्बाद हो रहे हैं वास्तविक योग्य लाभार्थी। अजीब तमाशा चल रहा है। लोकतांत्रिक सरकारों का अधिकांश बल,धन, व्यवस्था और संसाधन सिर्फ और सिर्फ ख़ुद के नाकारा शासन को बचाने, विरोधियों को बदनाम करने और अपने भ्रष्ट आर्थिक हितैषियों को बचाने में नष्ट हो रहे हैं।
……..
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119


