
गीत-पनप रही हैं धीरे-धीरे, बेलें भ्रष्टाचारी
पनप रही हैं धीरे-धीरे, बेलें भ्रष्टाचारी।
पर्दे के पीछे जो कुत्सित, हैं समक्ष संस्कारी।।
चौपायों का चारा खाकर, जो डकार ना लेते।
काहिल कर डाला जनता को, मुफ्त अन्न हैं देते।।
बात-बात पर रिश्वत लेकर, भरते निजी तिजोरी।
पर्दे के पीछे जो कुत्सित, हैं समक्ष संस्कारी।।
सरकारी धन भ्रमण विदेशी, रास उन्हें है आता।
रेहन भारत को रख खोला, स्विस बैंकों में खाता।।
करतूतें सब खुल जाएँगीं, धीरे-धीरे सारी।
पर्दे के पीछे जो कुत्सित, हैं समक्ष संस्कारी।।
जनता रक्षक खुद को कहते, भक्षक आज बने हैं।
छोटे बच्चों के लोहित से, उनके साथ बने हैं।।
केस एप्सटिन में भी देखो, रखते हिस्सेदारी।
पर्दे के पीछे जो कुत्सित, हैं समक्ष संस्कारी।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश


