
मेरा मानना है कि किसी भी व्यक्ति को जमीन से जुड़कर रहने के लिए अपने संस्कृति और त्योहारों से जुड़कर रहना आवश्यक है। किन्तु आज ये जुड़ाव निश्चित रूप से कमजोर होता जा रहा है जिसके तह में जाकर हमें समझने एवं अमल करने की आवश्यकता है। आज से कुछ दशक पहले जो हमें त्योहारों को लेकर उत्साह देखने को मिलता था क्या आज वो है, बिल्कुल नहीं। कारण क्या है, क्या लोग आज त्योहार को नापसन्द करते हैं, ऐसा कहना मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं होगा। तो आखिर असली कारण क्या है कि लोग अपने त्योहार को पसंद तो करते हैं किन्तु दिन प्रतिदिन उससे दूर होते जा रहे हैं। निश्चित ही इसका मात्र एक ही मूल कारण है और वो है समय का अभाव।
पहले बसंत पंचमी की आगमन होते ही गांव में होली गाना शुरू हो जाता था। लोग शाम होते ही झाल, ढोलक, करतार आदि लेकर इकट्ठा हो जाते थे फिर शुरू हो जाता था होली गाना । गायन शैली ऐसी होती थी कि जहांँ तक आवाज सुनाई देती थी होली की धुन और झाल-ढोलक की सुरमई आवाज पर लोग स्वतः थिरकने लगते थे। संयोग से मैं ऐसे ही सांस्कृतिक धरोहर रखने वाले गाँव में पैदा हुआ था यह मेरे लिए गर्व का विषय है। जब मेरे कानों में होली की यह गीत सुनाई देता “हो रही बौरो शिव हो रही बौरो, आजू चतुर बृजराज रंगवा में ” तो ऐसा लगता था मानो मैं वास्तव में होली का दीवाना हो गया और रोम-रोम प्रफुलित होकर ऐसे झूमने लगता जैसे कोई मोर बादल को देख वर्षा की संभावना से नाचने लगता है। किन्तु आज न तो वो गायन शैली रहा और न ही लोगों में वो उमंग इसका मुख्य कारण है लोगों का समयाभाव के वजह से होली का रियाज न होना। आज यदि होली गाई भी जा रही है तो महज औपचारिकता पूरी की जा रही है। नई पीढ़ी तो साथ मंडली में बैठने में भी अपना तौहीनी ही समझता है क्योंकि आधुनिकता के चक्कर में बिना आधुनिकता को वैज्ञानिक नजरिया से समझे वह अंधी आधुनिकता का शिकार हो चुकी है। हालांकि इसमें उनकी कोई दोष नहीं क्योंकि वर्तमान पूंँजीवादी व्यवस्था ने लोगों को मशीन बना कर रख दिया है लोगों के पास अपने बच्चे और परिवार के लिए भी पर्याप्त समय नहीं है ऐसी स्थिति में लोग अपने बच्चे को अपनी संस्कृति और त्योहारों के महत्व को समझा नहीं पाते और न ही इसके लिए समय दे पाते हैं। नतीजा बच्चा घर में सुलभ उपलब्ध मोबाइल को ही अपने मनोरंजन और ज्ञान- विज्ञान का साधन बना लेता है। फिर बच्चा धीरे-धीरे मोबाइल एडिक्टेड हो जाता है जहांँ अपनी सुरसा की मुंह फैलाए पूंजीवादी व्यवस्था घिनौनी चीजों को परोस देती है। बच्चे तो नादान ही होते हैं वो सहजता से शिकार बन जाते हैं। आज माता-पिता भी पूंँजीवादी भोग की संस्कृति के शिकार हो चुके हैं, उन्हें बच्चे के कपड़े तो दिख रहे हैं परन्तु उसके करनी नहीं दिख रहे। लोग हाय पैसा हाय पैसा के चक्कर में अपनी संस्कृति से कोसों दूर भागते जा रहे हैं। आज विरले ही हैं जिन्हें अपनी छय हो रही संस्कृति को लेकर चिंता है और इसके मूल कारण इस पूंँजीवादी व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं। आज जिसे रोजगार नहीं है वो रोजगार की चिन्ता में गला जा रहा है, और जिसे रोजगार है वह मशीन की तरह खटते-खटते मुर्दा बनकर जी रहा है। ऐसी स्थिति में भला समाज और संस्कृति के लिए कौन चिन्ता करे, राम जाने। और जो करेगा उसे यह वर्तमान व्यवस्था अपराधी घोषित करने में भी देर नहीं करती है, किसी न किसी बहाने अपराधी बना ही देती है। आज जो संस्कृति की दुहाइयांँ देकर सत्ता का सुख भोग रहे हैं जड़ तलाशें तो ये हमारे संस्कृति का सबसे बड़ा हत्यारा सिद्ध होंगे क्योंकि हमारी संस्कृति के सबसे बड़ा दुश्मन पूंँजीवाद के ये पोषक हैं।
छय हो रही संस्कृति को लेकर संवेदनाएंँ व्यक्त करने वाले तो बहुत मिल जायेंगे लेकिन इसका इलाज करने वाले तो ईक्का-दुक्का ही मिलेंगे। लेकिन अब चेत जाने की जरूरत है। आदमी न तो जानवर है और न ही मशीन इसे मनुष्य बनकर जिन्दा रहने के लिए अपने संस्कृतियों से जुड़कर रहना आवश्यक होता है। वास्तव में एक स्वस्थ व्यक्ति 8 घंटा ही बाहर का काम कर सकता है शेष समय उसे अपने परिवार, समाज और खुद के लिए देना चाहिए। तभी व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान, समाज और संस्कृति के लिए सोच सकता है और तभी इसे निरन्तर उन्नत बना सकता है। लेकिन आज लोगों को मशीन और जानवर बनाकर उनके सोचने की क्षमता को ही बाधित किया जा रहा है जो बेहद चिन्ता की विषय है। आज लोगों के पास समय नहीं की वह समाज के लोगों के साथ बैठे, चर्चा करे, क्या सही, क्या गलत है निर्णय करे। हम अपने बच्चों और परिवार के साथ भी पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं और न उन्हें सामाजिक रश्मों-रिवाज से जोड़ते हुए उनमें अपनी सामाजिक कर्तव्यों का बोध करा पा रहे हैं। अभी तो एक नई खतरनाक संस्कृति पैदा हुई है खूब कमाओ और ऐश करो। सुनने में तो ये बहुत अच्छा लगता है किन्तु क्या इस शोषण आधारित व्यवस्था के रहते सबके लिए संभव है, कतई नहीं । इसमें तो कुछ धुर्त लोग हीं सफल हो सकते हैं जिन्हें केवल खुद की चिन्ता है, भले ही समाज रसातल में जाए, लोग भूखे मरे तो मरे मेरा क्या। ऐसे निहायत घटिया सोच रखने वाले लोग हीं इसमें सफल होते हैं। ये लोग, चोरी, बेईमानी, रिश्वतखोरी या दलाली जैसे कोई भी घिनौना कृत कर सकते हैं। ऐसे लोग व्यक्तिवादी मानसिकता के होते हैं इन्हें समाज, संस्कृति की कोई चिंता नहीं होती है। वास्तव में ऐसे लोग भोग के दास होते हैं।
आज आवश्यकता है लोगों को अच्छी संस्कृति से जोड़ने की, निरंतर संस्कृति को उन्नत करने की, हर पर्व और त्योहार को उचित तरीके से मनाने की, अपने जड़ से जुड़ने की ताकि इसके माध्यम से हमारे अन्दर से व्यक्तिवादी मानसिकता का अन्त हो सके एवं सार्वजनिक मानसिकता अपना जगह बना सके। सब कहे हम सबके लिए हैं और ऐसा प्रतीत हो सब हमारा है। ऐसी सोच और इसपर आधारित संस्कृति ही मेरा मानना है हर तरह के अन्याय और विद्वेष का अन्त करेगा और मानव को मानव से जोड़ेगा। लेकिन ये तभी संभव होगा जब इस विषमता की जननी शोषकों की बनाई पूंँजीवादी व्यवस्था का अन्त होगा। अन्यथा लोग रोते हैं तो रोते रहें, दुहाइयांँ देते हैं तो देते रहें, कुछ नहीं होने वाला है और हालात बाद से बद्तर होता चला जाएगा। वास्तव में हमें अपनी संस्कृति की रक्षा करनी है और उसे उन्नत करना है तो हमें कांटा चुनने से अच्छा कांटा फैलाने वाली पेड़ को ही जड़ से उखाड़कर फेंक देना चाहिए।
अमरेन्द्र
पटना, बिहार।



