आलेख

क्या लिखूं, किस पर लिखूं सोचता ही रह गया, दिसंबर में बीत गई जाड़े की एक रात……….!

मदन वर्मा "माणिक"

सोचता रहता हूं सदैव पेशोपस भी बनी रहती है, मन में
चलते हैं विचारों के झंझावात, विचारों की लहरें बह रही,
विचारों की तेज – मध्यम हवाएं आ रही, मुझे छू कर चली
जा रही, मैं किसी भी तरह लपक नहीं पा रहा उन्हें बस एक ही
अहसास जी रहा मुझमें क्या लिखूं, किस पर लिखूं सोचता ही सोचता रहा फिर एक बार दिसंबर में बीत गई जाड़े की वह शब्दों के भंवर में कोहराम मचाती काली रात। मलाल नहीं इसी
तरह हर बार साल का आखरी महिना शानदार बीत जाता,
जब भी नया साल का नया महिना आता है, वो पल यादगार बन
जाते हैं।

क्या लिखूं सोचते – सोचते बहुत कुछ लिख जाता हूं। कभी ठहरता हूं कलम के साथ मगर विचारों का ताना-बाना रूकता
नहीं अक्सर सोचते हुए नींद में मीठे सपनों में खो जाता हूं, आंख लगती है, खुलती हैं और अहसास होता है उजाला हो गया, सुबह हो गई, उठो, तैयार हो जाओ। फिर अखबारों में और मोबाईल पर समाचारों बीच खो जाना है जो रोजाना का एक
जरूरी अभ्यास है, आगे बढ़ो फिर लिखना है, कड़ियों को जोड़ना है शब्द विन्यास में खो जाना हैं नया लिखना है, यह
मेरी मेहनत मेरा करमा है इसे ढोना, निखारना मुझे ही होगा।
लिखना भी कोई आसान नहीं होता अगर सबकी पसंद का लिखना हो तो लेखन के बाद की मिश्रित प्रतिक्रियाओं के भी
जवाब सवाल होंगे इसके प्रतिउत्तर देकर पाठकों को संतुष्ट भी
तो करना है। वह भी इसी दिसंबर की ठंड में तभी संतुष्टि मिलेगी।

बहुत विचार आते हैं लिखने पर इसीलिए इस धरती पर हमें
ऊपर से भेजा है। हालात लेखन को प्रभावित कर सकते है और
उसी के अनुरूप कई बार लेखन को गढ़ना भी पड़ता है। एक
लेखक, कवि, साहित्यकार अपने में समाए शब्द संसार से कभी
पीछा छुड़ा नहीं सकता। ये सदैव अपने मानव के जीवन में रचे-बसे रहते हैं, कलमकार को चैन नहीं लेने देते बल्कि चुनौती देते
हैं, लिखो, जरा इस पर लिखकर दिखाओ, झलक मारकर गहरे खाली स्थान में अदृश्य हो जाते हैं, मन के सागर में डूबते-उतराते भी दिख जाते हैं, लुकाछिपी का खेल हमेशा रचनाकार खेलते रहते हैं। इस तरह लेखन ट्रेन सदैव चलती रहती है। शब्द इसमें विचार बनकर चढ़ते उतरते रहते हैं।

फिर वही विचार लेखक के मन में तमाशबीन बने हैं क्या लिखूं, किस पर लिखूं सोचता ही रह गया, दिसंबर में बीत गई जाड़े की एक रात के साथ ऐ दिसंबर मैं जरूर लिखूंगा, यह अलग होगा
हरबार से अलग अनोखा और यादगार होगा, मगर आपको मेरी
कलम पर एतबार रखना होगा।

– मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर , मध्यप्रदेश

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