
धारा के विपरीत नाव का,वेग निकाला करते थे।
सापेक्ष गति निरपेक्ष मान,गुरुवृन्द पढ़ाया करते थे।।
जाने कितने प्रश्न हल किये,ज्यामिति के पैमाने से।
बड़े बड़े विद्वान पराजित,बेबस विवश जमाने से।।
खम्भे पर बंदर सा चढ़ना,और उतरना रुकरुक कर।
जीवन का पर्याय बन गया,जीना भी यूँ घुटघुट कर।।
अवनमन उन्नयन के फेरे में,थीटा भी जंजाल बना।
रचना औ प्रमेय साधते, जीवन थक कंगाल बना।।
भिन्नभिन्न अनुपात लगाकर,बट्टा प्रतिशत दिखता हूँ।
हल करने को प्रश्न बहुत से,विश्लेषण जब करता हूँ।।
गुणाभाग औ ऋणधन के,चक्कर में ऐसे उलझ गया।
कभी कभी ऐसे लगता कि-प्रश्न हमारा सुलझ गया।।
प्रायिकता के मध्य माध्यिका,बहुलक बनी घुमाती है।
मानक विचलन भेद न मालूम,जाने क्या समझाती है।।
आँख मूँदकर जबजब देखा,आयत वर्ग घनाभ मिले।
वृत्त और त्रिज्या के चक्कर,सूत्र बहुत नायाब मिले।।
जोड़तोड़ का गणित न आया,जीवन के असली रण में।
धूलधूसरित काया लथपथ,नश्वर ही दिखती है क्षण में।।
– डॉ.उदयराज मिश्र
शिक्षाविद एवं शैक्षिक सलाहकार



