साहित्य

संस्मरण जीवन साथी के साथ बिताए कुछ पल

मधु माहेश्वरी

पिछली बार जब मैं बेंगलुरु से गुवाहाटी  गई थी तो यहाॅं पर मेरे पतिदेव थे  और यहीं उन्होंने चिर-शांति वरण की थी। अपनी गृहस्थी को मैंने पतिदेव के साथ ही जीया है,भले ही मैं कहीं भी रही हूँ। हम हमेशा ही अपने आवास पर दोनों साथ आए हैं और मुख्य द्वार का ताला हर बार पतिदेव ने ही खोला है। लेकिन इस बार जब मैं यहाॅं वापस आई हूॅं तो पतिदेव नहीं है।  अजब-सी शांति है इस घर में, इतनी ज़्यादा शांति कि लगता है शांति काट खाने को दौड़ेगी ।दिल करता है कि शांत से जल में एक कंकड़ मारूॅं ताकि थोड़ी सी हलचल हो। वही घर.. वही सामान ..वही लोग… वही दुनियाॅं ….किसी के लिए कहाॅं कुछ रुकता है …लेकिन एक अजब सन्नाटा है मेरे घर में भी और मेरे अंतर में भी। जीवनसाथी जब पास होता है तो बहुत सी चीज़ें हम ग्रांटेड लेते हैं। कभी-कभी हम यह भी कह देते हैं जीवनसाथी को कि थोड़ी देर शांत बैठो.. मुझे कुछ लिखना है.. मैं सोच रही हूं.. मेरे विचारों की तन्यता भंग हो रही है..  अब लगता है कि इतनी ख़ामोशी कलेजे को दहला देने वाली होती है । वक्त़ हर घाव को भरता है मेरा  भी भरेगा और इसमें कोई शक नहीं कि भरना भी पड़ेगा क्योंकि नियति के आगे या कि कालचक्र के आगे हम सब बेबस है। फिर ये दुनियाॅं  भी न रोज़ किसी के आंसू देखती है न ही पोंछती है। जीवनसाथी में से किसी एक को तो जाना ही होता है ऐसा होता नहीं कि दोनों जीवन साथी एक साथ चले जाएं ।तो जो रहता है ,मुझे लगता है यह गहन शांति हर उस लाइफ़ पार्टनर की है जो दुनियाॅं में अकेला रह गया है ।फिर भी इस ख़ामोशी के बीच भी एक संवाद चल रहा है.. निरंतर .. अमुक वस्तु अमुक मौके पर दी थी, अमुक साड़ी अमुक मौके पर दी थी, यह सोफा उस मौके पर लिया था .. यानी मेरी तरह नौकरी पेशा व्यक्ति इसी तरह ज़िंदगी जीते हैं कि जो ज़रूरी सामान है उनको विशेष दिनों से जोड़ देते हैं। विशेष दिनों का आयोजन भी हो गया और आपके घर का या गृहस्थी का ज़रूरी सामान भी आपके घर में आ गया। अब हम लोग जिस दौर के हैं उस दौर में चीजों के साथ एहसास जुड़े हुए रहते हैं ।आजकल तो हर साल बच्चे सोफा बदल लेते हैं.. हर दो साल में फ्रिज बदल लेते हैं.. चार साल में गाड़ी बदल लेते हैं। चीजों से वह ममता या वह इमोशनल लगाव  हो ही नहीं  हो पाता है क्यों कि उससे पहले ही आपकी वह वस्तु नई से रिप्लेस हो जाती है।लेकिन हमें तो रिश्तों से भी लगाव है और अपनी चीजों से भी। हम लोगों का दौर अलग था ….आमदनी भी सीमित .. भरा पूरा परिवार था जिसके बीच उस आमदनी को बंटना होता था फिर भी ज़िंदगी बहुत मिठास के साथ ,बहुत संवेदना के साथ, बहुत गहरे रिश्तों के साथ आगे बढ़ती रही और अपने मुकाम तक भी पहुंच गई ।तो अब जो छोटी-छोटी चीज़े भी हैं उस हर चीज़ के साथ मुझे एक कनेक्शन नज़र आता है..कनेक्शन मेरा और अपने जीवन साथी का… वह कनेक्शन अपनी दास्तान ख़ामोशी में भी कह रहा है जिसको मैं अब ज़्यादा गहराई से  महसूस ही नहीं कर रही हूॅं ,उसे सुन भी पा रही हूॅं और कहते हैं ना कि जब हम दुनियाॅं से कटते हैं तो हम अपने अंतर की तरफ़ जाते हैं ठीक इसी तरह जीवन साथी दूर हो गए हैं तो उनकी हर एक चीज़ ,हर एक वस्तु ,उनकी कही हर एक बात अब सीधी दिल तक पहुंचती है ,सीधी कानों तक पहुंचती है ,सीधे संवेदना में जाती है और  दुनियांवी रूप से साथ न होने के बावजूद भी उस साथ को हर पल और अधिक गहराई से महसूस करवा रही है।
मेरे हाथ में कितनी फाइलें हैं जिनमें मेरे लिखे आलेख सुरक्षित हैं।जब तक पतिदेव रहे,मेरे आलेखों को कटिंग करके उसे प्लेन पेपर पर चिपका कर फाइल में रखते थे ताकि पेपर फट न जाए।इतनी ऑर्गेनाइज्ड तो मैं कभी हो ही नहीं पाई क्योंकि सब कुछ ऑर्गनाइज करने के लिए तुम जो थे।
मधु माहेश्वरी गुवाहाटी असम ✍️

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