आलेख

कतारबद्ध जनता

संजय मृदुल

आम जनता को कतारबद्ध करना आदि काल से शुरू हो गया था। जब दानवीर कर्ण, राजा बलि जैसे सम्राट रोज़ सुबह दान करते थे तो आम जनता लाइन लगाकर ही खड़ी होती रही होगी। ऐसा कहीं लिखा नहीं है बस अनुमान है।
फ़िर जब साधु संतों के आश्रम बने तो वहाँ भी आम लोग लाइन लगाकर उनके दर्शन के लिए जाते होंगे।
एक समय आया जब धार्मिक स्थल बनने लगे। वहाँ भी आम जनता लाइन लगाकर ही जाती होगी।
फ़िर जब राजा महाराजाओं का समय आया, वो जन दर्शन टाइप के आयोजन करते होंगे तो भी आम जनता ऐसे ही कतारबद्ध होकर महल के दरबार में जाती होगी।
एक दिन परिवर्तन हुआ और आया लोकतंत्र। अब चूंकि आदत पड़ गई थी जनता की कतारबद्ध होकर खड़े रहने की तो जनता की चुनी हुई सरकार ने जनता को लाइन में खड़ा कर दिया। कभी वोट के बहाने, कभी परमिट के, कभी सिनेमा के लिए कभी नल में पानी भरने के लिए।
अब जब यह अक्सर होने लगा तो सरकार को लगने लगा जनता आनंदित होती है लाइन में लगकर। संचार क्रांति, ग्लोबलाइजेशन, इंटरनेट के युग के आने के बाद लोगों के काम उँगलियों पर होने लगे।
सरकारें चिंतित होने लगी कि ऐसे तो आदत बिगड़ जाएगी सबकी। लाइसेंस राज ख़त्म हो चुका था। सैलरी ख़ुद ब ख़ुद बैंक एकाउंट में आने लगी थी। यूपीआई से भुगतान होने लगे थे। वर्क फ्रॉम होम का चलन शुरू हो चुका था। आमूल चूल परिवर्तन हो रहा था दुनिया में।
चिंतित सरकार ने एक उपाय किया। एक दिन अचानक सबसे कहा जो पैसा है आपके पास वो अब बदला जाएगा। बस जनता चंद घंटों में सड़क पर लाइन लगाकर खड़ी हो गई मशीनों के सामने।
सरकार खुश हुई कि पीढ़ियों के बाद भी मूल आदत नहीं बदली है जनता की। बस मौके कम हो गए हैं लाइन में लगने के।
सरकार को लगा कि ऐसे समय समय पर कुछ न कुछ करते रहना चाहिए जिससे प्रैक्टिस बनी रहे आम आदमी की। जो आदि काल से चला आ रहा है वह ख़त्म न होने पाए।
नोट बंदी से वापस कतारबद्ध हुई जनता अभी आराम की साँस भी न ले पाई थी कि आ गया कोरोना। सरकार ने निवेदन किया और जनता पुनः वेक्सीन के लिए कतारबद्ध हो गई। आज्ञाकारी जनता चुपचाप आदेश के पालन करती गई।
महामारी को गए पांच साल हो गए। जनता फ़िर आलसी होने लगी। टेक्नोलॉजी और उन्नत हो गई इन बीते सालों में। हर काम चुटकियों में होने लगा है। अब तो मोबाइल में बंद दुनिया सबका दिमाग पढ़ने लगी है। सरकार इस से फ़िर गंभीर चिंता में आ गई। अब क्या करें?
इसी बीच विश्व के दो देशों के बीच युद्ध छिड़ गया। बम, मिसाइल, ड्रोन, जाने क्या क्या उपयोग किया जा रहा युद्ध में। बस अंगुलियों में हरकत की, बटन दबाया और हमला हो गया। बम गिरे लोग मरे। बिल्डिंगें धराशाई होने लगी।
इस आपदा में सरकार को अवसर दिखाई दिया। अचानक से देश को मालूम पड़ा कि रसोई गैस की किल्लत होने वाली है। और हमारे देश की खासियत है कि जो कम होने लगता है उसकी डिमाण्ड बढ़ जाती है। कंपनियों ने अपने सर्वर डाउन कर दिए, एजेंसियों ने शटर। आम जनता फ़िर एक बार अलर्ट मोड पर आ गई। लोग आलसीपन छोड़ कर सिलेंडर कंधों पर लिये सड़कों में आ गए। जिनके घरों में तीन चार सिलेंडर हैं वे भी आदत न छूटे इस भय से कतारबद्ध होने लगे। एक तिहाई देश सड़को पर फ़िर से लाइन लगाए खड़ा है। बाकी के लोग भी जल्दी लाइन में लगेंगे सिलेंडर के लिए नहीं तो पेट्रोल डीजल के बहाने। युद्ध अभी लंबा चलने वाला है। गैस, पेट्रोल, डीजल के साथ और भी कई चीज़ों की किल्लत होगी तब बची हुई जनता कतारबद्ध होगी। आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी।

©संजय मृदुल

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