आलेख

सनातन शास्त्रीय मर्यादाओं का सरेआम उल्लंघन

डॉ. शीलक राम आचार्य

संस्कृत साहित्य में एक प्रसिद्ध श्लोक आता है –
‘न भीतो मरणादस्मि केवलं दुषितं यश:।
विशुद्धस्य हि मे मृत्यु: पुत्रजन्मसमो भवेत्।।(मृच्छकटिकम्)।’
एक पूर्व प्रधानमंत्री इस श्लोक को बार- बार दोहराकर अपने यश के दुषित हो जाने से भय की बात करते थे। लेकिन आज उनकी पार्टी ने कोई ऐसा काम नहीं छोड़ रखा है, जिससे उनके यश में बढ़ोतरी हो।इनका हरेक काम खुद की पार्टी को, सनातन धर्म को, सनातन संस्कृति को, सनातन जीवन मूल्यों को,भारत राष्ट्र को और भारतीय राजनीति को दुषित और कलंकित करने वाला दिखाई पड़ रहा है।हरेक स्तर पर भ्रष्टाचार, भेदभाव, जातिवाद, क्षेत्रवाद, अनुचित दोषारोपण,गाली गलौज और खरीद फरोख्त चल रहे हैं। इन्होंने हरेक मूल्य को धूल -धूसरित किया है।
सीताराम गोयल अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘सप्तशील’ में कहते हैं -‘अपने राज्य को कापुरुषता का पाठ पढ़ाने वाला राजा अधिक दिन तक राज्य नहीं कर सकता।’ भारत की हालत भी ऐसी ही है। देखते हैं कि इनकी सनातन धर्म और संस्कृति के विरोध की तानाशाही कहां पर जाकर समाप्त होती है।
हमारे यहां पर ‘राज्य सभा’ का सांसद बनने के लिये 20-20 करोड़ रुपए में विधायक सरेआम खरीदे -बेचे जा रहे हैं और लोकतंत्र निर्विरोध निर्विघ्न पूरी रफ्तार से चल रहा है। न सत्ताधारी दल को फर्क पड़ता है और न ही विपक्ष को।न खरीददारी करने वालों का कुछ बिगड़ेगा तथा न ही बिकनेवालों का। सभी सुरक्षित हैं क्योंकि धनी -मानी लोग हैं।धनी- मानी लोगों का पिछले 200 वर्षों के दौरान कुछ भी नहीं बिगड़ा है।ये पिछली दो सदियों से अपनी मनमानी करते आये हैं लेकिन कानून, संविधान, पुलिस, फौज आदि सब कुछ इनके सामने बेबश हैं। राज्य सभा का सांसद बनने के लिये खुद प्रत्याशी 100 से 200 करोड़ की घूस देता है। राजनीतिक दल भी यह खरीद -फरोख्त करते हैं तथा निर्दलीय प्रत्याशी भी विभिन्न दलों के विधायकों को खरीदने के लिये 20-20 करोड़ रुपए प्रति विधायक चुकाने के लिये तैयार रहते हैं। कानून भी यही है, संविधान में यही है, पुलिस भी यही है, न्यायालय भी यही हैं,फौज भी यही है – इन भ्रष्टाचारियों का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला। संसार में रुपया ही भगवान् है, रुपया ही सम्मान है,रुपया ही जीवन है, रुपया ही भोग विलास है तथा रुपया ही स्वर्ग है। सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी भगवान् का नंबर तो रुपये के बाद में आता है। संसार में रुपये से कुछ भी खरीदा और बेचा जा सकता है।पद,प्रतिष्ठा,सम्मान,उपाधि, शिक्षा,शिक्षक, शिक्षा संस्थान,गाड़ी,महल, जमीन,भोग- विलास,विधायक, सांसद, पुलिस,नेता, न्यायाधीश,वेश्या, लड़की,लडके,पति, पत्नी,अधिकारी,संत, स्वामी, संन्यासी, मुनि, भिक्षु, योगाचार्य, कथाकार,प्रवचनकार,चिकित्सक आदि किसी को भी रुपये चुकाकर खरीदा जा सकता है। यहां सब कुछ बिकाऊ है।जो नहीं बिकने पर अड़ा हुआ है,उसका भाव बढा दो।वह भी बिकने के लिये तत्पर हो जायेगा।जिस देश में नेता, धर्मगुरु,सुधारक,शिक्षक, चिकित्सक, न्यायाधीश ही बिकना शुरू कर देते हैं,उस देश में सब कुछ बिकाऊ माल हो जाता है।बस खरीदने के लिये आपके पास बैंक बैलेंस होना चाहिये। लोकतंत्र तो नाम का ही बचा है। हरेक स्तर पर जोकतंत्र,लट्ठतंत्र,लूटतंत्र चल रहा है। सर्वाधिक और सर्वप्रथम भ्रष्टाचार सत्ता और न्याय के शीर्ष पर शुरू होता है। फिर वह निचले स्तर पर फैलता है।आज वह समय आ गया है कि भारत के किसी भी विभाग, तंत्र, क्षेत्र में बिना भ्रष्टाचार के कोई काम नहीं होता है। कहीं भी जाओ,आपको कुछ न कुछ चुकाना ही होगा। यदि नहीं चुकाओगे तो हो सकता है कि आपको ही अपराधी बनाकर जेल में भेज दें या पुलिस वाले आपकी धुनाई कर दें। निर्दोष होकर भी आप निर्दोष नहीं हैं।सोनम वांगचुक, केजरीवाल,मनीष सिसोदिया आदि को ही देख लो। कितने महीनों तक इनको जेलों में रखा गया और बाद में निर्दोष कहकर छोड़ दिया। व्यवस्था ऐसी बन चुकी है कि निर्दोष अपराधी हैं और अपराधी निर्दोष हैं।एक राजनीतिक दल विशेष में शामिल हो जाने से आपका बलात्कारी,दुराचारी, भ्रष्टाचारी,गबनकारी,लूटकारी होना निर्दोषता में बदल जाता है। क्या ही कमाल का लोकतंत्र है?
हमारे प्रधानमंत्री ने इजरायल में जाकर भारत भूमि को ‘मदरलैंड’ तथा इजरायल भूमि को ‘फादरलैंड’ कहकर वाहवाही लूटने की कोशिश की है। कितना मूढतापूर्ण है यह सब?इनको भारतीय इतिहास का मामूली ज्ञान भी नहीं है। भारतभूमि सनातन से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का प्रचार- प्रसार करके समस्त संसार का मार्गदर्शन करती आई है।पारस और इजरायल तथा पारसी और यहुदी तो महाभारत के सदियों पश्चात् अस्तित्व में आये थे।पहल न तो पारस, इजरायल आदि देश थे तथा न ही पारसी और यहुदी मजहब मौजूद थे।
ऐसे में इजरायल हमारा बाप कब से हो गया? इन्हें इस तरह की टिप्पणियां करते शर्म और हिचक भी महसूस नहीं होती है। वास्तविकता तो यह है कि अरब,इराक,ईरान,मिश्र, इजरायल,युनान,रोम, मैक्सिको,अमरीका,चीन,जापान आदि देशों में भारतवर्ष से गये हुये लोगों ने ही वहां पर सभ्यता, संस्कृति, जीवनमूल्यों, खेती-बाड़ी, विज्ञान आदि का विकास करने में सहयोग दिया था। धरती के सभी हिस्सों में भारत से विस्थापित लोगों ने ही विकास के काम करके लोगों को जीवन जीना सिखाया था।पारस, इराक,मिश्र,युनान,रोम , मैक्सिको आदि से भारत लौटने वाले लोग वहां के मूल निवासी न होकर भारत से ही गये हुये आर्यों की शाखाएं थीं। पथभ्रष्ट होकर गये हुये लोगों की आबादी अधिक थी।मनु की बजाय ये दनु की औलादें थीं।
संघ के इंद्रेश कुमार मुस्लिम मंच चलाते हैं।एक शंकराचार्य से वार्ता करते हुये वो कह रहे थे कि मैंने दस लाख हिन्दू लड़कियों का विवाह मुस्लिम लड़कों से करवा दिया है।वह इसलिये ताकि वो हिन्दू लड़कियां मुस्लिम लड़कों को हिंदुत्व में ढाल सकें। पिछले 1300 वर्षों के दौरान ऐसा कभी नहीं हुआ है कि किसी हिन्दू लडकी ने मुस्लिम लडके से विवाह करके उसे हिंदुत्व में दीक्षित कर दिया हो। उल्टा खुद वह हिंदू लडकी ही अपना हिंदू नाम बदलकर मुस्लिम नाम रख लेती है तथा उनके गर्भ से होने वाली संतान भी मुस्लिम नाम रखती है, मुस्लिम मजहब को मानती है तथा हिन्दू को काफिर मानती है।इन मूढ़ों को इतनी भी समझ नहीं है कि इतिहास से थोड़ा भी सबक लिया जा सके। इन्होंने पिछले 100 वर्षों में जितने भी प्रयोग किये हैं,उनका नाम अब्राहमिक मजहबों यहुदी, ईसाई और इस्लाम मानने वालों को ही हुआ है। इन्होंने हिंदू को सदैव घाटे में रखकर इसे कायर, भीरु, डरपोक, भगोड़ा और दब्बू ही बनाया है।लिव इन रिलेशनशिप, विवाहेत्तर कामुक संबंध, समलिंगी विवाह आदि भी इनके द्वारा हिंदू को असहाय,भ्रष्ट, नाकाम,शक्तिहीन और मतांतरित करने के लिये शुरू किये गये हैं।इनकी मानसिकता शुरू से ही हिन्दू विरोधी रही है।ये केवल ऊपर से ही हिंदू हितकारी होने का ढोंग करते हैं। वास्तव में ये अब्राहमिक, म्लेच्छ और यवनी जीवन शैली के प्रचार-प्रसार करने वाले लोग हैं।
युवा विचारक निग्रहाचार्य भागवतानंद जी कहते हैं कि भारत ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र’ नहीं अपितु ‘अधर्म सापेक्ष राष्ट्र’ बना दिया गया है। सनातनी देवी देवताओं को स्वार्थवश जानबूझकर अब्राहमिक देवताओं के रंग में रंगा जा रहा है।योगदा सत्संग सोसायटी,इस्कान, रामकृष्ण मिशन, जग्गी वासुदेव, श्री अरविन्द, गांधी आदि के आंदोलनकारियों ने अब्राहमिक देवी -देवताओं की चापलूसी करने के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। ये सभी ‘क्षमा’ को ईसा मसीह से सीखने की सलाह देते हैं। भाईचारा मोहम्मद से सीखने की कहते हैं। ये सभी क्रिसमस और ईद खुशी से अपने आश्रमों में मनाते हैं लेकिन अब्राहमिक मजहबों के अनुयायी तो सनातनियों को काफिर और भटके हुये लोग मानते हैं। उपरोक्त तथाकथित महापुरुषों की वजह से सनातनी लोगों का चरित्र, आचरण और दिनचर्या सनातनविरोधी होते जा रहे हैं। सनातन धर्म और संस्कृति के मूल ग्रंथों को पढ़ने की कोई कोशिश नहीं करता है। शिक्षा -संस्थानों में इनके अध्ययन -अध्यापन की कोई व्यवस्था नहीं है।अब्राहमिक प्रभाव की पुस्तकें पढ -पढ़कर सनातनियों का मन मस्तिष्क विकृत हो रहा है।इस धरती पर केवल सनातनी ही ‘धर्मनिरपेक्ष’ होने का ढोंग करते हैं। अब्राहमिक मजहब अपने आपको ‘धर्मनिरपेक्ष’ नहीं मानते हैं। वास्तविकता यह है कि इस तथाकथित नकली धर्मनिरपेक्षता ने सनातन धर्म और संस्कृति का बहुत अधिक नुकसान किया है।कमी हमारे धर्माचार्यों में है, जनता- जनार्दन तो पथभ्रष्ट होगी ही। अब्राहमिक मजहबों और अल्पसंख्यको को सनातनी महापुरुषों पर कीचड उछालने का पूरा कानूनी संरक्षण प्राप्त है जबकि सनातनी लोग अब्राहमिक मजहबों के महापुरुषों और अल्पसंख्यकों के महापुरुषों पर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। गौहत्या सरेआम हो रही है। गौहत्या करने और करवाने वाले सनातन का चोला पहने बैठे हैं। यदि इसका विरोध किया जाये तो विरोधियों को ही सनातन- द्रोही घोषित कर दिया जाता है। समाचार- पत्रों का भी यही हाल है। सनातनी देवी -देवताओं और महापुरुषों पर आये दिन आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाती हैं, लेकिन इनको कोई फर्क नहीं पड़ता है। ज्यों ही किसी अब्राहमिक मजहब या अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति पर कोई टिप्पणी हुई नहीं कि तुरंत मुकदमे दर्ज हो जाते हैं।यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है?यह कैसा सर्वधर्म समभाव है?यह कैसा परस्पर का सद्भाव है? बहुसंख्यक समुदाय के लिये अल्पसंख्यकों पर जीवन के किसी भी स्तर पर तर्क, विचार, चिंतन, जिज्ञासा और प्रश्न करने के लिये जगह नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों को बिना किसी तर्क, विचार, चिंतन, जिज्ञासा और प्रश्न के बहुसंख्यककों के प्रति गाली -गलौज,अपमान,उपहास, अभद्र टिप्पणी और कीचड उछालने आदि का पूरा अधिकार मिला हुआ है। पिछले सात -आठ दशकों से हमारे नेताओं, धर्माचार्यों, सुधारकों और धनपतियों ने हमें इस प्रकार का भारत दिया है।

धर्मगुरुओं से जुड़े हुये कुछ प्रसंग लेते हैं।अमरीका (शिकागो) में प्रथम ‘विश्व धर्म संसद’ (11-27 सितम्बर, 1893) को आयोजित हुई थी।उस समय पर आर्यसमाज संगठन में सनातन शास्त्रों के उद्भट्ट विद्वान और विचारक मौजूद थे, लेकिन विश्व धर्म संसद में कोई भी आर्यसमाजी विद्वान या विचारक सम्मिलित नहीं हुआ।यह आश्चर्यजनक है। कहीं आर्यसमाजी विद्वानों और विचारकों की स्वदेश भक्ति, राष्ट्रभक्ति तथा क्रूर अंग्रेजी सत्ता के प्रति विरोध की भावना तो इसका कारण नहीं थी?विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों में बंटे हुये भारतवर्ष से कुल 11 धर्माचार्यों ने अपने-अपने धर्म-सम्प्रदायों का इस सम्मलेन में प्रतिनिधित्व किया था ।उनका विवरण अग्रलिखित है –
1. बम्बई से स्वामी विवेकानन्द (1863-1902) (सनातन हिन्दू धर्म/वेदांतदर्शन के प्रतिनिधि)
2. मद्रास से प्रो. जी.एन्. चक्रवर्ती (थियोसोफिकल सोसायटी, ब्राह्मण धर्म के प्रतिनिधि)
3. महुआ (जि़ला : भावनगर, गुजरात) से वीरचन्द राघव गाँधी (स्वामी विजयनन्द सूरि/आत्माराम के शिष्य) (1864-1901) (जैन-सम्प्रदाय के प्रतिनिधि)
4. बम्बई से बी.बी. नागरकर (ब्राह्मसमाज के प्रतिनिधि)
5. कलकत्ता से प्रताप चन्द्र मजूमदार (ब्राह्मसमाज के प्रतिनिधि)
6. लक्ष्मीनारायण
7. मद्रास से नरसिंहाचार्य (वैष्णव-सम्प्रदाय/ विशिष्टाद्वैतदर्शन के प्रतिनिधि)
8. श्रीलंका से अनागारिक धर्मपाल (महाबोधि सोसायटी, कलकत्ता के संस्थापक-अध्यक्ष) (1864-1933) (दक्षिणी बौद्ध : थेरवाद के प्रतिनिधि)
9. नदियाड़ (गुजरात) से मणिलाल नाभुलाल द्विवेदी (संस्कृत-विद्वान्, गुजराती-कवि) (1858-1898) (जैन-सम्प्रदाय के प्रतिनिधि)
10. बम्बई से मिस ज़ेनी सोराबजी (पारसी-सम्प्रदाय की प्रतिनिधि)
11. मद्रास से डॉ. एनी बेसेन्ट (1847-1933) (थियोसोफिकल सोसायटी की प्रतिनिधि)

विश्व-धर्म-संसद् (शिकागो, 1893) की कार्यकारिणी में सम्मिलित भारतीय थे-
1. जी.एस्. अय्यर (संपादक, द हिंदू, मद्रास)
2. मुनि आत्माराम उपाख्य विजयनन्द सूरि (श्वेताम्बर जैन-सम्प्रदाय, बम्बई)

उपरोक्त में एकमात्र स्वामी विवेकानन्द ही थे, जिन्होंने ‘सनातन हिन्दू धर्म’ के प्रतिनिधि के रूप में अपना पंजीकरण कराया था, शेष ने अपने सम्प्रदायों के नाम पर पंजीकरण करवाया था।
कहा जाता है कि ‘विश्व धर्म संसद’ में स्वामी जी के कुल छह व्याख्यान हुये थे –
1. स्वागत का उत्तर (11 सितंबर, 1893)
2. हमारे मतभेद का कारण (15 सितंबर, 1893)
3. हिंदू-धर्म पर निबन्ध (19 सितंबर, 1893)
4. ‘रिलीजन’ भारत की प्रधान आवश्यकता नहीं (20 सितंबर, 1893)
5. बौद्ध धर्म : हिंदू-धर्म की निष्पत्ति (26 सितंबर, 1893)
6. समापन सत्र में भाषण (27 सितंबर, 1893

अंत में स्वामी विवेकानंद ने सभी का धन्यवाद करते हुये कहा था कि मैं इस मंच पर से बोलनेवाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति- दोनों की शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।
लेकिन उपरोक्त संदर्भ में सोचने की बात यह है कि इसके बदले में सनातनधर्मियों को मिला क्या? बस,धोखाधड़ी, विश्वासघात, मतांतरण, लूटपाट, बलात्कार, संस्कृति भ्रष्टता,धर्मद्रोह, धर्मनिरपेक्षता, गुलामी और विश्वगरीब की उपाधि। स्वामी विवेकानंद, राधास्वामी,योगानंद, प्रभुपाद, श्री अरविन्द, जग्गी वासुदेव आदि ने इस पर कभी प्रकाश नहीं डाला है। अधिकांश में ये विदेशों में प्रचार करके वापसी में अपने साथ किसी न किसी अब्राहमिक नारी को अपने साथ में ले आये तथा अपने आंदोलन की बागडोर उनके हाथों में थंबा दी। एनी बेसेंट आदि ने बौद्ध मत की आड़ लेकर सनातन धर्म और संस्कृति को कमजोर करने का ही काम किया था।
पिछले सात -आठ दशकों से भारतीय धर्माचार्य सनातन धर्म, सनातन धर्मग्रंथ, सनातन संस्कृति, सनातन दर्शनशास्त्र को बचाने के लिये कुछ भी गंभीर प्रयास नहीं करके नेताओं के पिछलग्गू बन रह हैं।पद ,प्रतिष्ठा,धन,दौलत, पुरस्कार,महंगे आश्रम पाने के स्वार्थ में इनका व्यवहार मानवों जैसा नहीं होकर दानवों जैसा बन गया है। तर्क, विचार, चिंतन,मनन , विमर्श आदि सर्वत्र गायब हैं। महर्षि गौतम के ‘न्यायसूत्र’ में वर्णित वितंडा,छल आदि के द्वारा जनता-जनार्दन का माईंडवाश करके उनको अपनी सत्ता प्राप्ति का माध्यम बनाना इनको बखूबी आता है।
……….
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119

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