
चैत्र शुक्ल नवमी का पावन प्रभात,
अयोध्या में गूँजा मंगल गान,
धरा पर अवतरित हुए स्वयं धर्म,
लेकर मानव रूप – श्रीराम महान।
वह राम, जो केवल नाम नहीं,
आदर्शों का उज्ज्वल प्रकाश हैं,
जिनके हर एक कर्म में बसता,
मर्यादा का अमिट इतिहास है।
क्यों कहलाए “मर्यादा पुरुषोत्तम”?
यह प्रश्न युगों से मन में उठता है,
हर उत्तर उनके जीवन में,
धर्म की गाथा बनकर मिलता है।
पिता के वचन को शीश नवाया,
राज्य-सुखों को तिलांजलि दी,
चौदह वर्षों का वनवास स्वीकारा,
हँसते-हँसते हर पीड़ा ली।
न क्रोध किया, न रोष जताया,
धर्मपथ से न कदम हटाया,
ऐसा त्याग, ऐसा संयम—
राम को “पुरुषोत्तम” बनाता।
सीता सी पतिव्रता संगिनी,
हर दुःख में जो संग-संग चली,
वन की कठिनाई, रावण का छल,
पर नारी-शक्ति की मिसाल बनी।
एक ओर राम का अटल विश्वास,
दूसरी ओर सीता की मर्यादा,
दोनों का प्रेम बना आदर्श,
जग में सदा के लिए साधा।
लक्ष्मण सा भ्राता कहाँ मिलेगा?
जिसने सुख त्यागे, संग निभाया,
भाई के चरणों में अपना जीवन,
सेवा-धर्म का दीप जलाया।
भरत का त्याग अद्भुत न्यारा,
राजसिंहासन ठुकरा दिया,
खड़ाऊँ को रख सिंहासन पर,
भाई के प्रेम को अमर किया।
और हनुमान… वह भक्ति की मूरत,
शक्ति और समर्पण का सागर,
राम नाम जिनकी हर श्वास में,
सेवा में जिनका तन-मन अर्पित।
सागर लाँघा, पर्वत उठाए,
लंकापुरी में ज्वाला जगाई,
पर हृदय में केवल एक ही छवि—
“राम” नाम की ज्योति समाई।
दशरथ का वह करुण वियोग,
पुत्र-विरह में टूट गया मन,
राजा होकर भी असहाय रहे,
प्रेम का यह सबसे गहरा बंधन।
कैकेयी… जिसने माँ होकर भी,
वियोग की अग्नि प्रज्वलित की,
पर उसी निर्णय ने जग को,
राम की महिमा से परिचित की।
वन-वन भटके, राक्षस मारे,
धर्म का ध्वज ऊँचा किया,
अधर्म के अंत हेतु ही तो,
रावण का भी संहार किया।
यह कथा नहीं केवल युद्धों की,
यह मानवता का सार है,
हर पात्र में एक संदेश छिपा,
जो जीवन का आधार है।
राम सिखाते—वचन का मान,
सीता सिखाती—आत्मसम्मान,
लक्ष्मण सिखाते—सेवा-भाव,
भरत सिखाते—निष्काम दान।
हनुमान सिखाते—भक्ति अपार,
दशरथ सिखाते—प्रेम गहन,
और कैकेयी भी सिखा जाती—
निर्णय सोचो, फिर दो जीवन।
इस प्रकार सम्पूर्ण रामायण,
एक जीवन-दर्शन बन जाती,
हर युग, हर मनुष्य के भीतर,
मर्यादा की ज्योति जलाती।
आओ इस रामनवमी पर हम,
अपने भीतर राम बसाएँ,
त्याग, प्रेम, सेवा, सत्य के पथ पर,
जीवन को सफल बनाएँ।
संदेश:
राम केवल पूजने के लिए नहीं,
अपनाने के लिए हैं।
जब जीवन में मर्यादा, त्याग और सत्य आ जाए—
तभी सच्चे अर्थों में “राम” हमारे भीतर जन्म लेते हैं।
~जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”
युवा लेखक,कवि एवं साहित्यकार
सक्ती, छत्तीसगढ़




