
थक – थककर टूटना कैसा ?
गिर-गिरकर संभलना कैसा ?
हारकर बैठना कैसा ?
जीतना जानती हूँ मैं ।
आजाएँ विध्न वाधाएं ,
न बाँका बाल कर पाएं,
विपत्ति में धारकर धीरज ,
निकलना जानती हूँ मैं ।
फँसी हो मझधार में नैया,
छाया हो घनघोर अंधेरा,
भंवर के बीच ,थपेड़ों से,
निपटना जानती हूँ मैं ।
जीवन चाहे ज़हर बन जाए
जीने की आस छूट जाए,
सावित्री बनकर अन्तक से,
सत्यवान माँगती हूं मैं ।
मीरा – सी प्रीति पावन हो,
मित्रता हो कृष्ण सुदामा-सी ,
भक्ति प्रहलाद , ध्रुव जैसी ,
हुनर पहचानती हूँ मैं ।
सरोज शर्मा
दिल्ली




