साहित्य

ग़ज़ल

वाई.वेद प्रकाश

डूबी सम्मतियां हैं अधखिले सपनों की।
सहमी आकृतियां हैं धूप खिले सपनों की।
कोई परछाई संग नाच – नाच देख रहा,
खुलती गतिविधियां हैं अनखिले सपनों की।
यादें तो दूर-दूर पास – पास ज़िन्दगी,
सजती है तोरणद्वार फूल बंद सपनों की।
आयेंगे लौटकर जो बढ़े चले गये हैं,
बंद पड़े रास्ते व पगडंडी सपनों की।

सिहर – सिहर दखिनैया दहके पलाश वन,
गहरी सहमतियां हैं प्यार भरे सपनों की।

वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग,

डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!