आलेख

समर्पण * (मौलिक अनुभव )

मदन वर्मा "माणिक"

बचपन की यादें ताजा हो रही थी। वह छोटी कक्षा में मेडम का बेत से मारना अकारण ही, फिर डर के मारे, बहुत दिनों तक स्कूल ना जाना, दादाजी भी मास्टर थे, परेशानी समझ घर पर ही पढा़या, चालीस तक पहाडे़ भी मुंह जुबानी याद कराये फिर उनके स्कूल में भर्ती कर दिया, इंदौर के मल्हारगंज में बीसा नीमा स्कूल में, तभी से फर्स्ट, सेकंड नंबर से पास होने का सिलसिला रहा। दस साल के थे तभी लेखन का सिलसिला शुरु हुआ। फिर अखबार और पत्रिकाऐं पढ़ने का शौक हुआ। सबसे बडे़ अखबार ऐजेंट दुलीचंद जैन की दुकान पर सुबह और शाम बैठना हाथखर्चा भी निकलता और ढेरों अखबार, पत्रिकाऐं पढ़ने को मिलती। छोटी-मोटी रचनाऐं अलग छपती, साइंस में डिग्री लेते ही फार्मास्युटिकल कंपनी में असिस्टेंट केमिस्ट बना, दो साल बाद ही, सहारा की जनरल फुड्स कंपनी, इंदौर में लेब केमिस्ट रहा तीन वर्ष तक, साथ ही अर्थशास्त्र से पोस्ट ग्रेजुऐट करने के बाद एसबीआई में और उसके पहले एमपीईबी में चयन हुआ और एमपीईबी जाईन की।
बचपन से कालेज तक संघ, स्काउट दल, एनसीसी, राष्ट्रीय सेवा योजना एवं एथलीट होने से अनुशासन में रहना और लोगों की मदद करना जीवन का उद्देश्य आज तक रहा।

एमपीईबी में कर्मचारी यूनियन के अनेक पदों पर रहे और स्वतंत्र लेखनी भी चलती रही। इसी के चलते एकदौर दिसंबर सन् 2015 में ऐसा भी आया कि मुझे स्लिपडिस्क के रोग ने ऐसा जकडा़ कि हरतरह का इलाज ऐलोपैथिक, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, युनानी के साथ नीम, हकीम, डाक्टर, वैद्य सब फैल छः माह तक बिस्तर पर ही पडा़ रहता, घर वालों को परेशान होता देख दुखी, निराश होता था, खानापीना नित्यकर्म भी परिवार के लोग करवाते थे, जीवन के प्रति आशा ही खत्म थी। यह आशा ही नहीं थी कि मैं बैठ पाऊंगा, खडा़ हो पाऊंगा या चल पाऊंगा या नहीं। केवल मेरे आफीस वालों को पता था बीमार हूं लेकिन दूसरे दोस्तों को पता नहीं था, इसका कारण सोशल मीडिया पर में हमेशा ऐक्टिव रहता था। श्रीमतीजी सरकारी स्कूल में बाहर बागोद गांव में टीचर थी। दर्द बडा़ भयंकर होता था जैसे लकडी़ फट रही हो। ऐसा मन करता था कि अचानक मौत आ जाऐ तो खेल खत्म हो जाऐं, ज्यादा लंबे समय तक और दर्द नहीं सह सकता।

एक दिन मेरी बिछली लड़की भावना ने शोशल मीडिया पर मेसेज डाला कि मेरे पापा को स्लिपडिस्क है और बेड पर हैं किसी के पास कोई ईलाज हो तो बताऐं, उसी दिन शाम को एक मित्र का फोन आया, वर्माजी मैं शाम तक आ रहा हूं। वह आऐ और साथ में उनके साले जो योग में डाक्टरेट किये थे। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया। मेरा सारा कार्य मेरी पत्नी और छोटी लड़की नेहा करती थी, सबसे बडी़ लड़की रानू और दामाद ने भी बडी़ सेवा की। मेरा जो स्वभाव बचपन से युवावस्था तक का अख्खड़ था वह बहुत कुछ नरम होता जा रहा था। इस दौरान मेरे खास दोस्तों ने भी ईलाज कराने में कोई कसर नहीं छोडी़ थी। अब फिजीकल ऐक्सरसाइज शुरु हुई और अगले करीब एक वर्ष में मैं रिक्शे से आफीस आनेजाने लगा। जब बीमार था बेड पर हिल नहीं पाता था तब, मेरा सारा कार्य मेरे सहयोगी घर पर ले आते थे और मैं लेटेलेटे ही बोल बोल कर, अकाउन्ट्स कार्य रोकड़बही उनसे लिखवाता था। सहयोगियों ने जब तक बीमार रहा, मेरा कार्य संभाला, मुझे ऐहसास नहीं होने दिया मैं बेफिकर हो गया। जिंदगी का दृष्टिकोण उदारता, सहयोग और मदद करने का बन गया। परिवार के प्रति प्रेम और उनके समर्पण को देखकर और अधिक दया और समर्पण का हो गया।

छोटी लड़की नेहा पूरे समय ईलाज, डाक्टर, स्टोर्स और हर तरह की सेवा का कार्य एक मैनेजर की तरह और मेरे पास हर प्रकार की सेवा, हनुमान की तरह करती रही। करीब ढाई वर्ष की सेवा और करने के पश्चात बेहतर स्वास्थ्य की दृष्टि से संतुष्ट होकर मैंने, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। अब सेवानिवृति के पश्चात, यूनियन के माध्यम से कर्मचारियों की सेवा कर रहा हूं और अपना स्वतंत्र लेखन भी कर रहा हूं। ये समर्पण परिवार का मरते दम तक भुलाया नहीं जा सकता। नई जिंदगी मिली तो स्वभाव का उदारीकरण हो गया। विपत्ति में जिन दोस्तों ने साथ दिया। उनका यह रिण चुकाया नहीं जा सकेगा।

–मदन वर्मा “माणिक”
इंदौर, मध्यप्रदेश

दि. 10.12.2025

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