साहित्य

इन घुमड्ते बादलों का

डॉ.रमेश कटारिया पारस

इन घुमड्ते बादलों का क्या करे
अब नहीँ दिखती चमकती बिजलिया

नाव काग़ज़ की नज़र आती नहीँ
अब नहीँ बच्चे पकड़ते तितलियां

हर नदी और तालाब भी खामोश है
अब नहीँ दिखती नहर में मछलियाँ

जंगलों में वरच्छ काटे और लगाई आग है
अब कुलांचे मारती दिखती कहा है हिरणियां

ताप सूरज का कहा तक झेल पायेगी धरा
डर है हमको गल ना जाए मोम की ये पुतलिया

आम बौराने लगे तो कीट भी आने लगे
अब फलों के बोझ से झुकती नहीँ है डालियाँ

अब ना कहीँ शंख नाद खड़ताल बजते है कहीँ
अब बहुत से मंदिरों में बजती नहीँ है घन्टियां

हर जगह अब केसिटो के शोर का ही जोर है
शादियों में समधी को देता नहीँ कोई गालियाँ

पारस जी के शेर पर झूम जाते थे सभी
अब किसी भी छंद पर बजती नहीँ है तालियां

डॉ.रमेश कटारिया पारस
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