साहित्य

सहारनपुर की सर्दी भैया

कुलदीप सिंह रुहेला

सहारनपुर में जाड़ा जड़ गया,
धुंध ने डेरा डाला
कांप गए हाथ-पैर सभी के, सिहर उठा हर नाला
सुबह-सवेरे चाय की भाप ने, दिल को थोड़ा थामा
ऊनी स्वेटर, मफलर बोले, सर्दी ने ये कामा
गलियों में सन्नाटा सा है, सूरज भी शरमाया
धूप की किरनें दूर खड़ी हैं, कोहरे ने घेराया
नदिया की लहरें ठिठकी सी, पत्ते भी चुपचाप
सांसों में ठंडक भरती जाए, बोले मन का जाप
चूल्हे पर रोटी सेंक रही, माँ की मीठी तान
ठंड में भी घर गरम रखे, रिश्तों की पहचान
स्कूल की घंटी सुस्त पड़ी, बच्चे लपेटे हाथ
हँसी फिसलती होंठों पर, सर्दी का ही साथ
रात उतरते अलाव जले, गपशप का संसार
ठिठुरन में भी गर्म रहे, अपनापन-प्यार
सहारनपुर की सर्द हवा, कहती मीठी बात
मेहनत से जो जूझे यहाँ, गरम रहे हर रात
जाड़े की इस धुन में यारो, गुनगुनाओ गीत
कांपते हाथों में भी बसें, उम्मीदों की रीत
ठंड सही पर हौसले गर्म, धड़कन रहे जवान
सहारनपुर मुस्काए फिर, आए नई-सी जान!

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!