
कसक है अधूरी मिलन की पिया से,
न जाने कि कब पूर्ण यह चाह होगी,
प्रतीक्षा में गुजरीं कई यामिनी हैं,
मिलन की सुबह की कोई राह होगी?
हँसी चाँद जैसा तेरा रूप गोरा,
फ़क़त दूर से ताकता यह चकोरा,
तरसता तड़पता करे रात – दिन है,
कभी शान्त भी ये मेरी दाह होगी।
कसक क्या मेरे दिल में ही ये रहेगी,
कभी रूपसी क्या हमारी बनेगी?
कोई जाके पूछे है क्या दिल में उसके,
कि उसके भी दिल की कोई थाह होगी।
निकल जा रहा वक़्त है जैसे पल पल,
हुआ जा रहा त्यों ही दिल मेरा बेकल,
निराशा नहीं ठीक है यह, ‘नरेशा’
कभी तो ख़तम यह तेरी आह होगी।
– नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।



