साहित्य

खाते हैं वो सलाम

राकेश चन्द्रा

वो चाहते हैं सलाम, दिन-रात हर प्रहार,
खाते हैं वो सलाम, च्यवनप्राश की तरह।

सूखे हुए से पेड़ में दहकते हुए से फूल,
जंगल में आग हैं, वो पलाश की तरह।

वो बाँट लें किरण कोई, सूरज या चाँद हो,
जकड़े हैं चाँदनी को, कालपाश की तरह।

शायद कि झुरमुटों में, बसाया हो कोई गाँव,
उठते हैं हर कदम, नई तलाश की तरह।

बंजर हुई ज़मीन है, हैं फाकामस्त लोग,
सपने क्यों देखते यहाँ, मीदास की तरह।

कुछ कर सको तो कर लो, केवल यह आज है,
रंग शून्यता में भर दो, आकाश की तरह।।
@ राकेश चन्द्रा

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