साहित्य

कोहरे की चादर

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

‘कोहरे की चादर ‘

कोहरे की चादर ओढ़े शरद-सुहानी प्रात निराली,
ऊषा-रानी अरुणिम आभा सप्त रंगों में छलकाती है।
सखी-सहेली स्वर्णिम शबनम कोमल कणों में ढलकर,
फूल–फूल, वन–उपवन में शीतल सुख-रस बरसाती है।

दूर अँधेरा हो जग से, फैले जग का उजियारा,
खग नभ में विहरें उल्लसित, मधुर स्वरों में गाएँ।
हृदय पुकारे मेरा हर पल—पंछी-संग मैं भी उड़ जाऊँ,
दूर क्षितिज तक जाऊँ, जग में सुधा-रस बरसाऊँ।

कहीं आरती की ध्वनि उठे, कहीं गुंजित ‘जय श्रीराम’,
घंटे–घड़ियाल चहक उठे शस्य-श्यामला धरती पर।
बिखर रही रवि-रश्मियाँ, हर्षित मन राग सुनाए,
ज्ञान-प्रखरता जगमग करती कोहरे की लुका-छिपी पर।

दूर खड़े इस मौन कोहरे में भी सीखें हम जीवन-संदेश—
उजियारी की बेला में अब समय न अपना खोना।
अपने-अपने कर्म-पथ पर निश्छल भाव से चलकर ही,
निज कर्मों को जग-हित हेतु समर्पित करते रहना है।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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