साहित्य

वीर रस कविता पाठ का परित्याग … हास्य-व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति "जय'

एक कवि सम्मेलन में मुझे बुलाया गया। वीर रस में कविता पाठ करना था। हम बहुत खुश हुये। वीर रस में मेरी कविता जो सुनता है वह मल्लयुध्द करने को तैयार हो जाता।

एक बार दो भाई मेरी कविता पाठ सुनकर लड़ बैठे। एक दूसरे पर खतरनाक वार कर दिया। एक गंभीर रूप से घायल हो गया। बीच में कविता पाठ बंद करना पड़ा। भयानक दृश्य उपस्थित हो गया था।

वीर रस की कविता सुनकर एक कवि का दिमाग़ गरम हो गया। दूसरे कवि पर हमला बोल दिया। एक कवयित्री के अंदर भी जोश आ गया, घर जाकर पति से लड़ बैठी। पति के दो दांत तोड़ दिये ।

भाई साहब तब से वीर रस की कविता कहना बंद कर दिया। वीर रस की कविता सुनाते-सुनाते हमारे अंदर भी जोश आ गया। अपने उपर ही चाकू से वार कर दिया था। कई साल बीत गये। इस निमंत्रण से एक बार पुनः वीर रस की कविता सुनाने को मौका मिल गया है।

जैसे ही कविता पाठ करने उठा, लोग झूम उठे। हमारे अंदर का भी वीर रस जाग उठा। कविता सुनते-सुनते दो लोगों का वीर रस इतना जागा कि तलवार लेकर मुझे मारने के लिए घेर लिया। दोनों ने कहा आपने ऐसी कविता ही सुना दी मेरा तो मन एक व्यक्ति की हत्या करना चाहता है और आप जैसा इस तरह योग्य कोई नही है।

बहुत लोग इकट्ठा हो गये कि बेचारा कवि नाहक मारा जायेगा। उसके अंदर का वीर रस उतारा गया। हास्य कलाकारों ने हास्य कविता का रस भरा तब जाकर उनकी तलवार नीचे हुई । राहत की सांस ली। कवि सम्मेलनों में वीर रस की कविता का ठेका लेना बंद कर दिया।

………. जयचन्द प्रजापति “जय’
, प्रयागराज

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!