साहित्य

यार तेरी इतनी हिम्मत!

ज्योती वर्णवाल

याद आता है स्कूल का वो बीता हुआ जमाना,
किरण के संग क्लास में वो शोर मचाना।
जब आधी छुट्टी से पहले ही टिफिन खुल जाता था,
मेरा सबसे पसंदीदा निवाला तू खा जाता था।
पकड़े जाने पर मैं कहती— “यार तेरी इतनी हिम्मत!”
तू हँसकर कहती— “बस समझ ले मेरी किस्मत।”
वो चोटी खींचना और फिर छुपकर मुस्कुराना,
क्लास में टीचर के आने पर एकदम शरीफ बन जाना।
पीटी की क्लास में बहाने बना कर बच निकलना,
इम्तिहान के डर से एक-दूसरे का हाथ पकड़ना।
वो आखिरी बेंच की बातें और कागज़ की पर्चियाँ,
आज भी याद आती हैं वो छोटी-छोटी खुशियाँ।
आज घर-परिवार और ज़िम्मेदारियों में खो गई हूँ,
बचपन के उस अल्हड़पन से बहुत दूर हो गई हूँ।
दिल करता है फिर उसी पुराने स्कूल की बेंच पर जाऊं,
और किरण… फिर से तुझसे कहूँ— “यार तेरी इतनी हिम्मत!”

ज्योती वर्णवाल ✍️
नवादा (बिहार)

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