
जीवन के उस पार
जीवन के उस पार कोई मौन दीप जलता है।
जहाँ प्रश्न नहीं, केवल उत्तर ढलता है।
वहाँ समय थककर अपने पंख समेट लेता।
क्षण अनंत बनकर सत्य से लिपट जाता।
देह की सीमाएँ छूट जाती हैं वहीं।
आत्मा अपने ही भार से मुक्त होती है।
न नाम की चिंता, न रूप का अभिमान।
केवल चेतना का निःशब्द विस्तार होता है।
जो यहाँ था इच्छा, वहाँ बन जाता है शून्य।
जो यहाँ शून्य था, वही परम पूर्ण होता है।
मृत्यु एक द्वार है, अंत नहीं कोई।
वह जीवन की ही अगली भाषा बोलता है।
वहाँ कर्म स्मृति बनकर प्रकाश रचते हैं।
और मोह की छाया स्वयं गल जाती है।
जीवन के उस पार न कोई पराया है।
न अपना—सब एक में ही विलीन हो जाते हैं।
जो छोड़ा था यहाँ, वही सच बन जाता है,
मोह का हर आवरण स्वयं उतर जाता है।
जीवन के उस पार न अंत है, न विराम,
वह तो यात्रा है—शुद्ध प्रकाश का है दर्शन।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




