
पूस की रात थी
फुटपाथ पर सोया था
अपनी मां के साथ
छोटा बच्चा
भयंकर कंपकंपाहट
एक फटी चादर पर
तह की गयी दो फटी साड़ियां
ठंड रूक नहीं रही थी
मां से दुबका था
ठंड से नींद नहीं आ रही थी
मां, सबेरा कब होगा?
कोहरा और ओस से
चुभ रही है ठंडी
तू कहती थी
पापा रजाई लायेंगें
मां अपने आंचल से
छुपाते हुये बोली-
सो जा मेरे लाल
यह पूस की रात
बड़ी निर्दयी है
थपकियां देने लगी
सुलाने का प्रयास करती मां
पर ठंड से
दोनों कांप रहे थे
बड़ी निर्दयी रात है रे
सो जा
मेरे लाल
सो जा
प्रयागराज ‘
यह कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित ‘पूस की रात’ गरीबी, ममता और कठोर सर्द रात की अमानवीयता को मार्मिक ढंग से उकेरती है। पूस की काली रात में फुटपाथ पर अपनी मां के साथ सोया एक छोटा बच्चा भयंकर ठंड से कांप रहा है, जहां एक फटी चादर और दो फटी साड़ियों की तह ही एकमात्र आड़ है। ठंड रुकने का नाम नहीं ले रही, बच्चा मां से दुबककर पूछता है कि सबेरा कब होगा, कोहरा और ओस उसकी कोमल त्वचा को चुभ रही है।
वह मां की पुरानी बात याद करता है कि पापा रजाई लाएंगे, लेकिन मां आंचल से उसे छुपाते हुए सांत्वना देती है—सो जा मेरे लाल, यह पूस की रात बड़ी निर्दयी है। थपकियां देकर उसे सुलाने की कोशिश करती मां खुद भी ठंड से कांप रही है, और रात की क्रूरता दोनों पर भारी पड़ रही है। अंत में दोहराई गई पंक्तियां—बड़ी निर्दयी रात है रे, सो जा मेरे लाल—मां की लाचार प्रेमपूर्ण पुकार बन जाती हैं, जो सामाजिक विडंबना और मानवीय संवेदना को गहराई से छूती हैं।




