
सुबह की सुहानी भोर है
जो नहायी हुई है शबनमी बूंदों से
और …,
प्रकृति ने किया है श्रृंगार अनुपम
अपना ….,
पुष्प लताओं और सुमनों से
वहीं ,वसुधा ने ओढ़ी है चुनर
रंग बिरंगे पुष्पों की –और
कल कल करती बहती -सरिता
पुष्प लतायें लदी पड़ी है
अगणित रंग बिरंगे पुष्पों से
और –अधखिली हुई कलियों से
वहीं ….,
उपवन की फिजायें महक उठी हैं
खिली हुई सुमनों से
सुबह की सुहानी भोर में
आओ प्रिये …,
चलो चलें उपवन में संग संग
करने को दीदार
प्रकृति के अनुपम श्रृंगार का
सुबह की सुहानी भोर का ..||
शशि कांत श्रीवास्तव



