
हुआ धरती पर हुआ वसंत आगमन,
खिले कहीं कहीं है कुछ सुमन, प्रसन्न नहीं धरती माता का अंतर्मन,
इसलिए पूछती है वो सबसे कुछ प्रश्न।
जिन हाथों में थामी हैं कुल्हाड़ी आरी,
उन्हीं हाथों से कर रहे तुम वसंतोत्सव की तैयारी,
नष्ट कर दिए सारे खेत और क्यारी,
अंतरिक्ष में हैं बहुत से प्रयोग जारी।
पैदा कर दिए हर तरफ कंक्रीट वन,
कैसे कहां बहेगी अब उन्मुक्त पवन,
कहां रहेगा प्रिय मतवाला वसंत,
कैसे बहेगा अब प्रिय मस्त मकरंद।
कैसे लगेगा यहां सरस्वती जी का मन,
कैसे रहेगा श्वेत हंस उनके संग,
फिर भी वर मांगोगे तुम इंसान,
कैसे करोगे तुम सरस्वती जी का ध्यान।
प्रश्न सुन कर मैं निरुत्तर हुआ,
दोषी हूं मैं कुछ कह न सका,
कोई सुझाव हो तो तुम बताओ,
या धरती माता को तुम समझाओ ।
संजय प्रधान
देहरादून।




