साहित्य

अटल थे, अटल ही रहोगे आप

सीता सर्वेश त्रिवेदी

 

अटल थे, अटल ही रहोगे आप,
राष्ट्र-निर्माण के सच्चे दीपक आप।
बुनियादी ढाँचों का किया विस्तार,
विकास की राहों को दिया आकार।

दूरसंचार, सामरिक शक्ति का उद्गार,
स्वर्ण चतुर्भुज के थे शिल्पकार।
राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा हर क्षण,
अटल थे, अटल ही रहोगे आप।

सुशासन की राह दिखाई आपने,
जन-जन के मन में विश्वास जगाया आपने।
राजनीति में मानवता का संचार किया,
शब्दों में अपनापन, कर्मों में प्यार भरा।

हर जन के मन-मंदिर में बसे आप,
अटल थे, अटल ही रहोगे आप।

स्वस्थ समाज का स्वप्न संजोए आए,
अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को भी आगे बढ़ाए।
सर्व शिक्षा अभियान से ज्ञान का प्रकाश,
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दिया नया आकाश।

बारहमासी सड़कों का जाल बिछाया,
विकास को गांव-गांव तक पहुँचाया।
चंद्रयान-1 से बढ़ा भारत का मान,
अटल पेंशन योजना बनी संबल की पहचान।

बहुआयामी विकास के सूत्रधार आप,
अटल थे, अटल ही रहोगे आप।

सेवा, संवेदना, समर्पण था मंत्र महान,
यही था आपके विकास का प्रमाण।
“मेरी इक्यावन कविताएँ”,
“मृत्यु या हत्या” — साहित्य का अमर गान।

संसद के तीन दशक के कवि थे आप,
“गीत नया गाता हूँ, हार नहीं मानूँगा”
गुनगुनाते हुए बढ़ाते रहे विश्वास।

अटल थे, अटल ही रहोगे आप।

स्वच्छता हो, चिकित्सा हो, करुणा का साथ,
तभी बनेगा सशक्त राष्ट्र, यही था आपका पाथ।
हर प्रात खिले, हर जीवन मुस्काए,
ऐसा भारत आपने सपना सजाए।

अटल विचारों की धारा आज भी देती सीख,
जन-जन का कल सुधरे, यही थी आपकी रीति।
हर पल दिलों में बसते हो आप,
अटल थे, अटल ही रहोगे आप।

नमन उस युगपुरुष को, जिनका था यह विश्वास,
स्वस्थ भारत, सक्षम भारत—यही सच्चा विकास।
जय अटल, जय भारत, देश महान,
आप पर गर्व करे सारा हिंदुस्तान।
सीता सर्वेश त्रिवेदी शाहजहांपुर

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