
अयोध्या की पावन माटी से, सूर्यवंश का नूर निकला,
मान्धाता की पावन पीढ़ी से, साहस का कोहिनूर निकला।
रघुवंश की मर्यादा लेकर, क्षत्रिय धर्म निभाया था,
अहिबरन ने बुलंदशहर में, ‘बरन’ गढ़ बसाया था।
यौधेयों की संतान हैं हम, ‘वीर योद्धा’ कहलाते,
सांकृत्यायन और पाणिनी भी, गाथा जिनकी गाते।
माता चामुंडा की छाया में, सफल हर एक कर्म रहा,
हाथों में व्यापार-शौर्य, वीरता ही धर्म रहा।
दुश्मन ने जब ललकारा तो, भीषण रण दिखलाया था,
प्राण दिए पर वीरों ने, अपना धर्म निभाया था।
देश के कोने-कोने में, अपना मान बढ़ाया है,
आज विश्व के हर हिस्से में, ‘बरनवाल’ कुल छाया है।
छब्बीस दिसंबर की तिथि, गौरव का गान कराती है,
अहिबरन की अमर कहानी, रगों में जोश जगाती है।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)



