
कान्हा के नित दर्शन को अब,
व्याकुल है राधा न्यारी।
सुध-बुध खोती सुनकर मुरली,
बोल रही राधा प्यारी॥
वृन्दावन के कृष्ण कन्हैया,
बरसाने की है राधा।
प्रेम अलौकिक है दोनों का,
नहीं प्रेम में भव-बाधा॥
युगों युगों तक अमर रहेगी,
बेमिसाल है ये यारी।
सुध-बुध खोती सुनकर मुरली,
बोल रही राधा प्यारी॥
मोहन की मनमीत राधिका,
बरसाने की है छोरी।
पनघट पर जब-जब आती है,
कृष्ण करें तब बरजोरी॥
कृष्ण प्यार में घायल राधा,
तन-मन-धन सब है वारी।
सुध-बुध खोती सुनकर मुरली,
बोल रही राधा प्यारी॥
कुञ्ज गली में राधा मोहन,
निशदिन रास रचाते हैं।
संग गोपियन झूला झूलें,
ग्वाल-बाल सुख पाते हैं॥
अमर प्रेम की अद्भुत गाथा,
घर-घर में नित है तारी।
सुध-बुध खोती सुनकर मुरली,
बोल रही राधा प्यारी॥
नित दिन तरसें दर्शन को सब,
कान्हा सबको है प्यारा।
ग्वाल सखा नित खेलत हैं मिल,
मोहन आँखों का तारा॥
रास रचाता है मधुवन में,
संग राधिका बनवारी।
सुध-बुध खोती सुनकर मुरली,
बोल रही राधा प्यारी॥
डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’*
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




