आलेख

भारत का विपक्ष: लोकतांत्रिक गतिविधि से सरोकार नहीं सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक पोलिटिक्स

प्रो सुबोध कुमार झा 'आशु'

इस बात की चर्चा शुरू करने के पहले मैं यह कहना चाहता हूं कि भारत में दो तिहाई से अधिक बहुसंख्यक तथा मात्र एक तिहाई से कम अल्पसंख्यक समाज के लोग हैं फिर भी सभी विपक्षी दलों में यह होड़ मची हुई है कि उस एक तिहाई पर कब्जा हो जाए मगर उन्हें यह अभी तक मालूम ही नहीं है कि ये वर्ग जहां भाजपा जैसी पार्टी को जो उम्मीदवार हराने का माद्दा रखता है बस उसे ही अपना उम्मीदवार मानता है चाहे वो भाजपा छोड़कर जिस किसी भी दल का है।बस यही बात समझ में नहीं आती और विपक्ष उसी बोट बैंक के पीछे लगकर ऐसी हरकतें करते हैं ऐसी स्टेटमेंट्स देते हैं जिससे एक बहुत बड़ा वर्ग नाराज़ हो जाता है और सत्तारूढ़ पार्टी यही तो चाहती है तथा अपनी पकड़ बहुसंख्यक पर और भी मजबूत करते जाता है। यहां मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूं बहुत शिक्षित वर्ग ऐसे भी हैं जो परिस्थितिवश विपक्षियों की हरकतों से सत्ता पक्ष पर जाने को मजबूर हो जाते हैं वे भी सत्ता की कुछ गतिविधियों से इत्तेफाक नहीं रखते।खुद मेरी भी मतिभिन्नता है। विपक्ष के लिए ऐसी भी क्या मजबूरी है आप ग़लत धारणाएं व गतिविधियां जो कट्टरपंथियों बस संचालित होतीं हैं उसका विरोध खुलेआम क्यों नहीं ढ् हैं। इतनी बड़ी बड़ी घटनाएं हो रही हैं पड़ोसी मुल्क में फिर भी विपक्ष के मूंह से एक शब्द नहीं निकलते ऐसा इसलिए कि कहीं वोटबैंक नाराज़ न हो जाए।अरे भाई हो जाए तो हो जाने दो आप को यह समझ में नहीं आती कि इससे बड़ा पक्ष आपसे दूर हो रहा है। कोई तथाकथित दलितों की राजनीति की रोटियां सेंकते हैं परन्तु वही जब दीपू दास की हत्या होती है तो मौन हो जाते हैं।बस यही तो है जनता समझ जाती है कि ई सब कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनीतिक दुकान चलानी है इसलिए स्वाभाविक रूप से लोग मजबूर हो जाते हैं कि चलो अच्छा है कम से कम देशहित की बात तो करते ही हैं।बस यही बात विपक्ष को समझना चाहिए। दुसरी भयानक गलती है कि आतंकवाद पर खुलकर साथ नहीं आते लीपापोती करने में लगे रहते हैं और हर हमेशा सरकार को घेरने के चक्कर में अपना ही नुकसान कर बैठते हैं।
पहले तो आपने कहा कि भटके हुए नौजवान हैं बेरोजगारी में आतंक का रूख कर लेते हैं इससे कुछ पैसे मिल जाते हैं। लेकिन अब क्या कहोगे साहब जब पढ़ा लिखा सफेदपोश डाक्टर जिसे मां बाप ने बड़े कष्ट व अरमान से पढ़ाया एक इंसान बनाने के लिए। उन्होंने कभी भी नहीं सोचा होगा कि उसका बेटा एक आतंकवादी बने लेकिन दुर्भाग्यवश कट्टरपंथियों ने उसका भी ब्रेनवाश कर दिया अब क्या कहोगे? पहले तो कहा करते थे कि सरकार सजग नहीं है तभी तो विस्फोटक आ जाते हैं परन्तु अब क्या कहोगे भाई अब तो स्वयं विस्फोटक तैयार कर रहे हैं तथाकथित पढ़े लिखे आतंकवादी। विडंबना तो देखिए डाक्टर पकड़े गए और तथाकथित आतंकवादी डाक्टर का घर जब उड़ाए जाने लगे तो कुछ मौकापरस्त लोगों ने कहना शुरू किया कि उसने गलती की सिर्फ उसे ही सजा मिलनी चाहिए लेकिन उसके मां बाप भाई बहनों ने क्या किया था। वाजिब है उसने क्या किया था लेकिन यह तो हो गई एकतरफा सोच न? आपने कभी ये सोचा कि जिसने राह चलते लोगों के चिथड़े उड़ा दिए उसके मां बाप भाई बहिनों ने क्या ग़लती की थी वे तो वाट जोह रहे होंगे कि आफिस से अब आ जाएगा। यही समस्या है भारत की। ग़लत लोगों को डिफेंड करने वाले थोक में मिल जाते हैं। पहले नैरेटिव गढ़ते हैं और फिर दुष्प्रचार में लग जाते हैं।
आजकल भारत दो गुटों में बंटा है एक सनातन समर्थक और दुसरे सनातन विरोधी। दुर्भाग्यवश सनातन धर्म मानने वाले लोग भी राजनीतिक पृष्ठभूमि में सनातन संस्कृति का खुलेआम विरोध करते हैं। जहां सनातन समर्थकों की राह राष्ट्रवाद पर आधारित होकर सत्ता तक पहूंचना उसे सुरक्षित तथा संरक्षित करना है वहीं दुसरे पक्ष का उद्देश्य सत्ता लोलुपता में सनातन तो क्या यदि देश का भी विरोध करना पड़े तो मंजूर है। इसीलिए तो ऐसा देखा गया है कि सेना के शौर्य पर भी सवाल उठाए गए हैं।साथ ही भारत विरोधी संस्था से हाथ मिलाने में कोई गुरेज नहीं है अर्थात ऐन केन प्रकारेन एक पुरानी बड़ी पार्टी के नेतृत्व में सत्ता हथियाने तक की साज़िश होती रही है। बात यहां यह नहीं है कि सनातनी के अतिरिक्त बाकी सभी देश विरोधी हैं ऐसा बिल्कुल नहीं है परन्तु सत्य यह है कि सत्ता हथियाने के चक्कर दो धर्मों के बीच खाइयां बढ़ा रहे हैं जिसका असर देश की स्थिति पर पड़ता है और यहीं विपक्ष की हो जाती है क्योंकि जब देशहित की बात होती है तो जनता की लगभग दो तिहाई आबादी देश के पक्ष में मिलते हैं और वर्तमान सत्ता पक्ष विपक्ष पर भारी पड़ जाता है। विपक्ष को कब समझ आएगा कि जनता ही जनार्दन है।
सिर्फ अंत में यही कहूंगा कि विपक्ष इस बात से अनभिज्ञ है कि बहुसंख्यक समाज को नाराज करने का मतलब है सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने का रास्ता बंद करना और लगभग वही हो रहा है।
*(लेखक एक शिक्षाविद् है।)*

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