साहित्य

बिटिया क आचरन(कुण्डली)

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा 'अकिंचन '

बिटिया केहु से मिलहु जब,कर आदर प्रेम सन बात।
चन्दा बिन सिंगार के, सगरो शीतल प्रभा दिखलात।।
शीतल प्रभा दिखलात जगत में,सबकर मन हरसात।
जाने कउन भेष में प्रभुवर,आवहिं मिलन के धावत।।

बप्पा कहत सुनहु ऐ बिटिया! ना बन तू खटपटिया।
हिय जिय,दिल दिमाग,शांत सदा रखिहे हे बिटिया।।
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परिवार क सुख
तू करनी काहें अइसन करै, कि बहू जाय बिलगाय ।
मधुरहि बानी पुचकार से,पशुवन के भी लेय रिझाय।।
पशुवन के भी लेय रिझाय,जे चाहत बस सेवा-सानी।
प्यार अउर सहकार सदा,चाहत ह हरदम हर प्रानी।।
कहै अकिंचन सुनहु मोर भाई,बहू सेवै गैया जइसन।
छाइल रहै गरूर सदा,ना कर करनी भइया अइसन।।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा ‘अकिंचन ‘
चल भाष-९३०५९८८२५२

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