
नवरात्रि की नवमी तिथि है, सुबह से गली में बहुत चहल-पहल है। दरवाज़ों पर दस्तकें हैं, आवाज़ों में आग्रह है- अरे बहनजी, कोई कन्या हो तो भेज दीजिए… पूजन करना है, प्रसाद खिलाना है। थालियाँ सजी हैं, आरती की लौ टिमटिमा रही है, और लोग देवी के स्वरूप (कन्या) की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं।
यह दृश्य देखकर मेरे होंठों पर एक तीखी, व्यंग्यात्मक मुस्कान उभर आई। मन ने जैसे सवालों की झड़ी लगा दी- क्या यही वह समाज नहीं है जहाँ बेटी के जन्म पर घर की खुशियाँ आधी रह जाती हैं? लोगों के चेहरे लटक जाते हैं,दबी आवाज़ में “बेटी हुई है” बामुश्किल कह पाते हैं।जहाँ आज भी बेटे की चाह में बेटियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है? अगर कन्या सच में देवी है, तो उसका अस्तित्व जन्म लेने से पहले ही क्यों समाप्त कर दिया जाता है?
आज वही लोग, जो कभी “बेटा चाहिए” की रट लगाते नहीं थकते, गली-गली कन्याओं की तलाश में हैं। यह कैसा विरोधाभास है? यह कैसी आस्था है, जो सुविधा के अनुसार बदल जाती है? क्या यह पूजन सच में श्रद्धा का प्रतीक है, या फिर एक सामाजिक औपचारिकता-एक ऐसा पाखंड, जिसे निभाकर हम अपने अपराधबोध को ढक लेना चाहते हैं?
हम दुर्गा के शौर्य की गाथाएँ गाते हैं, लक्ष्मी से समृद्धि की कामना करते हैं, सरस्वती से ज्ञान की याचना करते हैं, पर जब यही तीनों स्वरूप एक बेटी के रूप में हमारे घर में जन्म लेना चाहें तो हम उसे स्वीकार करने से कतराते हैं। यह कैसी विडंबना है कि देवी की मूर्तियों के आगे सिर झुकाने वाला समाज, जीवित कन्याओं के अधिकारों को कुचलने में संकोच नहीं करता?
कन्या पूजन के दिन हम जिन नन्हें पैरों को धोते हैं, क्या कभी हमने उनके भविष्य की राह भी साफ करने की कोशिश की है? जिन हाथों में हम आज उपहार थमाते हैं, क्या कल उन्हीं हाथों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर देंगे? या फिर उन्हें परंपराओं, बंदिशों और लोग क्या कहेंगे की जंजीरों में जकड़ देंगे?
सच तो यह है कि यह पूजन हमारे समाज के भीतर छिपे द्वंद्व का खुला प्रदर्शन है। एक ओर हम कन्या को देवी का दर्जा देते हैं, दूसरी ओर उसे बोझ समझते हैं। एक ओर हम उसके चरणों में झुकते हैं, दूसरी ओर उसकी इच्छाओं को रौंद देते हैं। यह केवल विरोधाभास नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक बीमारी है
-एक ऐसी मानसिकता, जो आज भी बराबरी को स्वीकार करने को तैयार नहीं।
कन्या पूजन का वास्तविक अर्थ – थालियों, चुनरियों और उपहारों में नहीं है। इसका सार उस सम्मान में है, जो हम हर दिन अपनी बेटियों को देते हैं। यह उस विश्वास में है, जो हम उनके सपनों पर जताते हैं। यह उस साहस में है, जिससे हम समाज की रूढ़ियों के विरुद्ध खड़े होते हैं।
जब तक बेटी को जन्म लेने का अधिकार सुरक्षित नहीं होगा, जब तक उसे शिक्षा, सुरक्षा और स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक हर कन्या पूजन केवल एक खोखली रस्म की तरह रहेगा। एक ऐसा आवरण, जो हमारी संवेदनहीनता और स्वार्थ को छिपाने की नाकाम कोशिश करता है।
आज जरूरत है कि हम इस पाखंड को पहचानें और इसे तोड़ने का साहस जुटाएँ। जरूरत है कि हम देवी की पूजा करने से पहले, बेटी को जीने का अधिकार दें। क्योंकि सच्चा पूजन वही है, जहाँ श्रद्धा शब्दों में नहीं, कर्मों में दिखाई दे।
मेरी यह व्यंग्यात्मक मुस्कान दरअसल एक सवाल है – ऐसे विचारों को समर्थन करने वाले लोगो से – क्या वो सच में कन्या को देवी मानते हैं, या केवल अपने अपराधों को ढकने के लिए उसका पूजन करते हैं?
“कोख में ही मारकर पापों का पर्व रचाते हो,
फिर नवरात्रि में भक्त बनकर ढोंग दिखाते हो।
शर्म भी सर झुकाए खड़ी है तुम्हारे आचरण पर,
मार कर बेटियों को अब किस मुँह से कन्या खिलाते हो?”
प्रतिमा पाठक
दिल्ली



