
अगनित शिकायते हैं पेड़ों से छांव की।
खटकती हैं दूरियां शहरों से गांव की।।
बचपन जहाँ बिताये वो घर दरक गया –
रहरह खसक रही है मिट्टी भी पांव की।।
मिलता है ठौर सबको संकट के दौर में।
नाहक पड़ा है तूँ अब भी और और में।।
पैदल ही लोग भागे जब आया कोरोना –
औषधि से कम नहीं हैं हवायें गांव की।।
सच कहा तो छू गया इल्ज़ाम की तरह।
रहते हैं लोग घर में गुमनाम की तरह।।
कितनों ने बड़ी देर तक मारी फब्तियां –
भाती हैं जिनको बोलियां कांव कांव की।।
डॉ.उदयराज मिश्र



