साहित्य

गीत आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ.

सुन्दर लाल मेहरानियाँ

आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ, बेरुजगार जवानों की।
रोज देखता चिता सुलगते, मैं इनके अरमानो की।।
आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ…….

गहने बेच दिये सारे,बस एक नौकरी पाने को।
खेत क्यार भी लगें फिसलते’,अन्न मिले ना खाने को।।
हसरत होती मर जाने को,कोई फिक्र नहीं इन जानों की।
रोज देखता चिता सुलगते,मैं इनके अरमानो की।।
आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ…….

लगी नोकरी मेरे यार की,साथी खुशी मनाते अब।
गये भूल पैसे का मोल,पानी की तरह बहाते अब
लगे उड़ाने दावत जमकर,कदर बढ़ी यारानो की।
रोज देखता चिता सुलगते,मैं इनके अरमानो की।।
आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ……..

लगे कि पेपर रद्द हो गया,गिरने लगी बिजलियाँ यूँ।
लगा डूबने घर मातम में,सुनने लगी सिसकियाँ यूँ।।
रिश्ता भी फिर टूट गया,बदली यूँ नजर घरानों की ।
रोज देखता चिता सुलगते, मैं इनके अरमानो की।।
आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ………

लगा टूटने शख्स बहुत,छुप_छुप कर अब रोता है वो।
मिले ना चैन सुकूं दिन को,ना रात को अब सोता है वो।
लिखूँ इबारत एक नई,इन फंदो के अफ़सानो की।
रोज देखता चिता सुलगते,मैं इनके अरमानो की।।
आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ……

आओ सुनाऊँ एक दास्ताँ, बेरुजगार जवानों की।
रोज देखता चिता सुलगते, मैं इनके अरमानो की।

✍️ सुन्दर लाल मेहरानियाँ

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