
देह का त्याग किया, पर शीश न झुकने दिया,
माँ भारती की खातिर, हँसकर जीवन दे दिया।
रणभूमि में गूँजा नाद, जय-जयकार पुकारा,
वीर चला इतिहास रचने, मृत्यु को ललकारा।
लहू से लिख दी गाथा, साहस की पहचान,
एक नहीं, सौ जन्मों का बन गया अभिमान।
तन भस्म हुआ पर ज्वाला, और प्रचंड हो आई,
वीरों की इस आहुति ने, धरती स्वर्णिम बनाई।
न भय रहा, न मोह रहा, बस कर्तव्य का मान,
प्राणों से ऊपर रखा, उसने राष्ट्र सम्मान।
शत्रु भी थर-थर काँपे, ऐसी हुंकार भरी,
मिट्टी बोली वीर सपूत, तूने लाज रखी।
देह का त्याग किया, पर नाम अमर हो गया,
हर हृदय में आज भी, उसका स्वर हो गया।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




