
पूजन करती राम का, पालन करती नीति।
मर्यादा का ज्ञान दो, करूँ सभी से प्रीति।।
मातु-पिता की मैं सभी, आज्ञा लूँगी मान।
राम सिया ने जो रची, अपनाऊँ वह रीति।।
शिरोधार्य गुरुदेव की, हर आज्ञा-आदेश।
त्याग कर्म की राह पर, दूँगी सारी भीति।।
जिससे जब भी जो मिले, लूँगी उत्तम ज्ञान।
भले मित्र या शत्रु हो, सबके प्रति हो प्रीति।।
क्लेश-कलह की भावना, उर से दूँगी त्याग।
मुख नित उच्चारित करूँ, राम-नाम की गीति।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




