
चल रहा ये सफर, जीवन का सफर।
इसमें आनंद ही आनंद,
साथ ग़म के भी बादल,
कब तलक चलेगा,नहीं है खबर।
कितने मोड़ आए औ गए कुछ गिनती नहीं।
अरे! फुर्सत ही किसे थी, जो गिनता उन्हें।
अब मिले हैं जाकर कुछ फुर्सत के लम्हें, जिन्हें जीते हुए,
चलते ही जा रहे हैं, ये कैसी रवानी।
कुछ गम औ खुशी का खास एहसास नहीं।
यह सारे पल हैं प्रभु! अब तेरे लिए।
तेरे-मेरे बीच की दूरी है मिटानी।
रह गई अब तो एक यही कहानी।
तेरी सृष्टि का हर इक कोना है तुझी से।
महकता हुआ औ गमकता हुआ।
जीवन का सफ़र है ये कैसा सफर,
कोई जाना नहीं, कोई समझा नहीं।
फिर भी चलते जाना है, चलते ही जाना है।
उतार-चढ़ाव बगैर,
सफ़र कोई पूरा नहीं,
भावों की दरिया में
बहते जाना है।
यादों का कलरव ही
गुनगुनाते रहना है।
सुषमा श्रीवास्तव ,
रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




