साहित्य

दुश्मनों की तरहा

डॉ.रमेश कटारिया पारस

वो जिनको चाहा था कभी हमने पागलों की तरहा
याद आये है वही आज हमको दुश्मनों की तरहा

वो लिखे बैठे है लेन देन बरसों का
ये जिंदगी तो है पानी के बुलबुलों की तरहा

मन पपीहे को तो एक ही बूँद काफ़ी थी
प्यार बरसा है हम पे बादलों की तरहा

जिनको पाना ही जिंदगी का मक़सद था

भूल जाएँगे उनको सुबह के सपनों की तरहा

उनका ख़याल उनका तस्सवुर उनकी याद
सम्भाल के रक्खा है हथेली के आबलो की तरहा

डॉ.रमेश कटारिया पारस

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