
ख़ामख़ाँ उत्सव मनाया सफलता का जग में
कर में लिए प्रशस्तिपत्र ठोकरें खा रहा
क्यों मेरी भूख से कोई भयभीत नहीं?
जाति, धर्म से ऊपर उठो झूठा कर दिया जग को
बेरोजगारी की भयावहता निगल रही यौवन को
मुट्ठी भर चावल के बदले बेच दूँ क्या खुद को
धैर्य खो रहे डिग्री तकते, परदेश मुड़ते धुरंधर
पंजा भर ज़मीन दे दो पैर टिकाना चाहूँ
पड़ा रहने दो अलमारी में संविधान खतरे में नहीं
खतरे में है मेरी जान बख़्श दो ना पीड़ा हो रही
फ़िका पड़ गया चेहरा तिरंगे का
चखकर मेरे अश्रृ का स्वाद मातृभूमि भी रो पड़ी
कितनी बार निर्वस्त्र करूँ सियासी कुछ तो शर्म करो
चुनावी वादों का परिधान ओढ़े दर दर बे इज़्ज़त होऊँ
यह एक मेरा मसला नहीं मुद्दा है बड़ा बलवान
बाहर से घर में कदम धरते ही उपहास भरी नज़रें है तकती
एक वक्त के बाद परिवार के प्यारों को
बेरोज़गार बेटे की दो रोटी भी बोझ है लगती
परिहास की कंटिली तलवार सीधी
आत्मसम्मान को बेध निकलती
लाखों की कुर्सी पर बैठा राजा क्यों लज्जित नहीं
देश की देह में रीढ़ समान मैं, मेरी ही कोई रीढ़ नहीं
दी तो सही सह संदर्भ हर व्याख्या अपनी लाचारी की
कहो क्या बैठ जाऊँ मचान बाँधकर रखवाली करते खेतों की?
या बैचूँ चने मूरमूरे भरकर डिग्री छपे सफ़हों में
कोई तो ऐसी प्रक्रिया हो जो परिमाण दें वादों की
देते हो व्यवसाय कोई या कर दूँ एलान-ए-खुदकुशी
मेरे मिटने के बाद शायद
बेरोजगारी का ज्वलंत मुद्दा उजागर हो
लडियाँ बुनूँ ख़्वाबों की, या अधूरी छोड़ दूँ आशाएं
असमंजस में खड़े युवाओं का लहलहाता चीत्कार हूँ
भीतरी हलचल ने शोर मचाया गुबार आज छलक पड़ा
काश कुहासा छंटे, किरणों का हो एकाधिकार
सोचता हूँ लगातार क्या सोचकर चुनी थी ये सरकार
जिसे मेरी परेशानियों से नहीं है कोई सरोकार।
भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर




