साहित्य

एक पूर्ण स्त्री

जयचन्द प्रजापति 'जय'

एक पूर्ण स्त्री
………

तुम तो प्रेम में
एक कहानी बनाई थी

सुंदर सपने थे
तुम्हारे साथ रह लूंगी

कोई शिकायत नहीं होगी
तुम्हे खुश रखूंगी

एक फुलवारी की तरह
महकाऊंगी तुम्हारा घर

मेरा साथ रहेगा
उन सब हालातों में

मैं समर्पित होकर
तुम्हारे साथ रहूंगी

आज तुम क्यों टूट रही हो
खिल्लियां उड़ा रही हो

बिगड़े हालातों पर
तुम ताने दे रही हो उसको

इस बार तुम्हे साड़ियां नहीं दी
कुछ कमियां रह गयी

जरूर समय की हालातों में
प्रेमवर्षा में कमी रह गयी हो

किसी और के घर
चली जाना

तुम एक पूर्ण स्त्री
नहीं बन पाई।

…….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

यह कविता जयचंद प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित एक मार्मिक रचना है, जो प्रेम, समर्पण और लैंगिक अपेक्षाओं की विडंबना को उजागर करती है। कविता में वक्ता एक स्त्री को संबोधित करता है, जो प्रेम की कहानी बुनकर सपनों की दुनिया रचती है—साथ निभाने, घर को फुलवारी बनाने, हर हाल में समर्पित रहने का वादा करती है। लेकिन वास्तविकता में बिगड़े हालातों पर वह टूट जाती है, ताने देती है, शिकायतें करती है।

वक्ता व्यंग्यात्मक लहजे में कहता है कि प्रेमवर्षा में कमी आ गई, साड़ियां न देने जैसी छोटी बातों पर वह किसी और के घर चली जाना चाहती है। अंत में कटाक्षपूर्ण टिप्पणी है कि वह ‘पूर्ण स्त्री’ नहीं बन पाई, जो समाज द्वारा थोपी गई आदर्श छवि—सब्र करने वाली, शिकायत न करने वाली—का खंडन करती प्रतीत होती है। यह रचना प्रेम की नाजुकता, स्त्री की अपेक्षित पूर्णता की मिथक और जीवन की कठोर सच्चाइयों पर गहरा चिंतन कराती है, जिसमें हास्य और करुणा का मिश्रण है।

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