

एक तरफ़ दर्द था, दूसरी तरफ़ फ़र्ज़ था,
ज़िंदगी के तराज़ू पर बोझ ही बस दर्ज़ था।
कैसे करता कोई फ़ैसला अपने दिल के ख़िलाफ़,
बहन की हर पीड़ा में भाई का ही फ़र्ज़ था।
बड़ी स्वाभिमानी थी, आज्ञाकारिणी सी वो,
कैंसर से जूझती बहना—मौत ही जिसका मर्ज़ था।
उठाते रहे हर ख़र्च मिलकर बाप और बड़ा बेटा,
इलाज के हर मोड़ पर बस खोने का डर था।
बहुत बोझ उठाया बाप ने, घर के हर इक कोने का,
छत भी उसी की ज़िम्मेदारी थी, वही घर का सरताज था।
अपनी ज़रूरतें उसने कब की छोड़ दी थीं,
क्योंकि पिता होना सिर्फ़ रिश्ता नहीं—एक फ़र्ज़ था।
वो भी अगले दिन छोड़ गया हम सबको तन्हा,
क्या करता बेचारा, सिर पर लाखों का कर्ज़ था।
दो जनाज़े उठे, घर एक ही दिन में उजड़ गया,
एक तरफ़ ममता मरी, दूसरी तरफ़ सब्र था।
मक़्ता
“दिलकश” कहे—ये आँसू नहीं, क़र्ज़ हैं हालात के,
एक तरफ़ दिल टूटा था, दूसरी तरफ़ फ़र्ज़ था।
*दिनेश पाल सिंह दिलकश*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




