
उठो निर्भया अब खुद को संभालो, पहचानों
अब कोई कान्हा , तेरी चीर हरण पे ना आयेगा
हर नुक्कड़ पे दुःशाषण यहाँ पे अड़ा खड़ा है
अब तुम ही इनको सबक दे समझा पायेगा
चीर हरण नारी की जब जब होती जाती है
भीष्म पितामह जैसे। सज्जन मौन हो जाता है
नारी की अस्मत लुट जाने पर भी जब सभ्य
आँखें मूँद कर्तव्य से विमुख बिल में छुप जाता है
तुम्हारी ये लड़ाई है तुमको ही है जग से लड़ना
कानून भी शायद तेरे साथ खड़ा दिख। जायेगा
लाख मुसीबत तेरे राह में रोड़े आगे अटका जाये
तेरी ही हिम्मत तेरे मार्ग प्रशस्त कर दिखलायेगा
अबला नहीं तुम। आज कमजोर नहीं हो तुम
दुनियाँ को अपनी ताकत का लोहा मनवा देना
तुँ काली है तुँ ही दुर्गा है रणचन्डी बन जा तुम
महिषासुर को बध करने वाली मर्दानी जतला देना
एक बार तो इतिहास लिख दे मेरी मासुम बहना
फिर कोई जालिम राह पे ना हिम्मत दिखलायेगा
खुद पे जुल्म की अदालत सजा लो जग में अब
कोई तेरी चीर हरण करने का कुकर्म ना कर पायेगा
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




