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ग़ज़ल

नीलम अग्रवाल "रत्न"

क्यों गिला रखें ग़ैर से यारों,
पूछ लें खै़रियत कहीं शायद ।

फ़क्र क्यों करें जिस्म़ पर हम तो,
एक दिन बने ख़ाक यही शायद ।

लफ़्ज़ से भरे घाव जो गहरे,
शब्द हो ज़ुबां पर वही शायद ।

जो ख़ुशी मिली आज इस दिल को,
बांट ले इसे अज़नबी शायद ।

फ़िर दुआ मिलेगी तुझे सबकी,
नेमतें ख़ुदा की मिली शायद ।

हम करें नए साल का स्वागत,
आज़ भूल कर ग़म सभी शायद ।

बेरुखी़ दिलों से मिटे नीलम,
ज़िंदगी हंँसी ये बनी शायद ।।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
🙏🙏

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