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मैं हूँ घर का राजदुलारा

ज्योती वर्णवाल

मैं ही हूँ घर का राजदुलारा,
मम्मी-पापा की आँखों का तारा।
रोज़ सुबह माँ प्यार से जगाए,
“उठो लल्ला” कह गले लगाए।
दादी तेल की कटोरी लाती,
मालिश कर मेरा बदन सजाती।
हड्डियों को वो मज़बूत बनाती,
ढेर सारा अपना प्यार लुटाती।
घोड़ा-गाड़ी का खेल निराला,
दादाजी की पीठ ने मुझे संभाला।
उनकी गोदी में सुख मैं पाता,
सबका प्यारा बच्चा कहलाता।
बाल दिवस पर माँ ने सजाया,
स्वामी विवेकानंद का रूप बनाया।
मैम ने दी शिक्षा सबसे प्यारी,
“भारत माँ है तुमको प्यारी।”
मैम कहतीं— “उठो, जागो और तब तक न रुकना,
जब तक लक्ष्य के आगे न झुकना।”
खूब पढ़ूँगा, देश बढ़ाऊँगा,
नन्हा विवेकानंद बन जाऊँगा।

रचनाकार ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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