
बचपन से शौक रहे मुझे कविताई के,
पढ़ती थी ज़्यादा, न थे शौक लिखाई के।
पढ़ना और गुणना ही मन को भाता था,
कविता लिखने का तब भी मुझे आता था।
स्कूल निकल कर घर के काम सँभाले,
इक्कीस वर्ष में ही शादी कर डाले।
फिर तो बस घर–गृहस्थी में डूब गए,
शह्ने–शह्ने परिवार के ही हम हों गए ।
दिन बीते, एक दिन कुछ यूँ मन में आया—
काग़ज़,कलम मैंने फिर हाथों में पाया।
बैठी–बैठी सोच रही अब करना क्या है,
नारी–शक्ति पर ही कुछ लिखना है।
कलम चली कागज़ पर फिर ऐसे बहके,
मानो माँ सरस्वती फुसफुसाईं मेरे कानो में ।—
“लिख दे कुछ ऐसा जो सबको भा जाए,
नारी–शक्ति की पीड़ाएँ भी सामने आ जाएँ।”
एक लेख लिखा मैंने, एक कविता भी,
एक महीने उसे पढ़ती रही मैं तभी।
मन में एक ज्योति सी जाग उठी जाने कैसे,
जैसे वीणा की धुन बजती हो भीतर वैसे।
वो रचना फिर एक पत्रिका में भेजी,
पत्रिका आने की खुशी—कहे न कहे जी!
ये खुशियाँ केवल महसूस ही होती हैं,
लेखन की विधाएँ ऐसे ही खिलती हैं।
अपनी गुड़िया के स्कूल की कविता प्रतियोगिता में पहला वो लेख छपा,
मेरे मन का कोना छलक-छलक उठा।
फिर तो लिखने का मैंने मन बना लिया,
कल्पनाओं की गठरी को एक आयाम दिया।
फिर एंड्रॉयड मोबाइल हाथ में आया था,
सोशल मीडिया पर अपना खाता बनाया था।
मोबाइल भी चलाना मुझे कहाँ आता था,
बच्चों ने सहारा दिया—तो सीख लिया था।
अपने पेज पर लिखने की शुरू हुई पारी,
फिर गुरूप से जुड़ने की ठानी तैयारी।
सबसे पहले मेरी कविता को सम्मान मिला,
अंतरराष्ट्रीय साहित्य परिवार के मंच पर स्थान मिला ।
यही है मेरे जीवन की साहित्य-यात्रा,
जहाँ आ. अंजलि किशोर “ कृति “जी से मिला सुंदर ज्ञान-दीपक।
मेरी कई रचनाओं को फ़िर सम्मान मिला,
फिर अनेक समूहों में वर्चस्व बढ़ता चला।
करती हूँ आभार सभी का दिल से मैं,
आगे भी आशीर्वाद मिले—यही चाहती हूँ मैं।
स्वरचित (मौलिक)
कवयित्री ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार)
अंतरराष्ट्रीय कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🙏


