साहित्य

गजल

नरेश चन्द्र उनियाल

चाँदनी रात, ये जिंदगी हो गई,
तू मुझे मिल गई, दिल्लगी हो गई।

वो सुहानी हवा सी, बही इस कदर,
बाग में हर तरफ, ताजगी हो गई।

पूजता हूं उसे रात-दिन हर घड़ी,
वो खुदा है, मेरी बंदगी हो गई।

गुनगुनाने लगा हूं उसे आजकल,
पार हद के ये दीवानगी हो गई।

तीर की क्या भला, है जरूरत उन्हें,
कातिला उनकी ये सादगी हो गईं।

रात-दिन आपको देखता ही रहूँ,
दीद ये आपकी, तिश्नगी हो गई।

नूर तेरा मुझे जब से है मिल गया,
लापता एकदम, तीरगी हो गई।

नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

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