साहित्य

गतिमान समय

सुमन पंत ’सुरभि ’

“बीत गया जो समय हमारा, फिर वो लौट के आता नहीं,
हर क्षण में अनमोल है जीवन, पर ये सत्य जताता नहीं।

समय न रुके किसी की खातिर, ना सुख में, न पीड़ा में,
जो समझे इसकी गति को, जी उठे वो हर एक पीड़ा में।

हर सुबह नयी आस लाती, हर संध्या कुछ कह जाती है,
समय की ये धारा जीवन में, अनगिन रंग भर जाती है।

तुम थाम न पाओ इस राही को, संग संग केवल चलना सीखो,
हर पल को अपनाओ ऐसे, जैसे फिर वो ना मिलना देखो।

चलता रहे समय का रथ, थमता नहीं कभी कहीं एक क्षण,
सुख-दुख की परछाई के संग , हर दिन बदले जीवन का रण।

जो ठहरा पीछे छूट गया, जो बढ़ा वही तो बना प्रकाश,
समय सिखाए जीना हर पल,जीवन की यही विशेष मिठास।”
–सुमन पंत ’सुरभि ’

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