
हम कोई ऊंची अट्टालिका नहीं,
हम दूब हैं।
जमीं को पकड़े हुए
अपनी जड़ों से –
गहराई तक जकड़े हुए
आंधियां तो आयेंगीं,जायेंगीं
हम जस के तस रहेगें
जिनकी जड़ें जमीन से –
गहराई तक जुड़ी रहती हैं
ऐसी इमारतें कब –
आंधियों से गिरती हैं
वेदमन्त्रों की ऋचाएं
गा रही हैं गान मेरा
पर्वतों के शीर्ष पर भी
विस्तृत वितान मेरा
जिनमें संस्कारों की जड़ें
मजबूती से जुड़ी रहती हैं
अंधड़ बवंडर में भी
साथ खड़ी रहती हैं
जिनकी जड़ें जमीन में
गहराई तक गड़ी होती हैं
उनकी विस्तृत शाखाएं
तूफानों से बड़ी होती हैं।
– डॉ उदयराज मिश्र



