साहित्य

बयार हूँ बसंती

कमला बिष्ट 'कमल'

बयार हूँ बसंती मंथर-मंथर मैं चलती ।

स्वाधीन हूँ मैं किसी की ना सुनती ।

उतावली बहुत हूँ कहीं ना मैं टिकती ।

कभी बस्ती तो कभी विजन में ठहरती ।

 

तनिक तुम ठहरकर सुनो गीत मेरा ।

कितना मधुर है सर-सर संगीत मेरा ।

दूर-दूर तक तुम नज़र अपनी डालो।

शीतलता को मेरी हृदय में बसा लो ।

 

सर-सर बहूँ मैं किंचित रुकना ना चाहूँ

चंचल पवन हूँ सबके मन को मैं भाऊं ।

सारा जहान मैं चुटकियों में घूम आऊं ।

मुदित मन से सदा मुलमुल मुस्कुराऊं ।

 

खेत-खलिहानों को मैंने सदा ही रिझाया।

सरसों की बालियों को हिंडोला झुलाया ।

मसूर की नन्ही फलियों को मैंने लुभाया।

कुसुमों को मुस्कुराना भी मैंने सिखाया ।

 

मेरे स्पर्श मात्र से झूमे तरुओं की डाली ।

तरु पात मिलकर बजाते हैं अजब ताली ।

उड़ाती हूँ मैं गोरी की लट काली-काली।

बयार हूँ बसंती सब ऋतुओं से निराली।

-कमला बिष्ट ‘कमल’
अल्मोड़ा उत्तराखंड

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