
बयार हूँ बसंती मंथर-मंथर मैं चलती ।
स्वाधीन हूँ मैं किसी की ना सुनती ।
उतावली बहुत हूँ कहीं ना मैं टिकती ।
कभी बस्ती तो कभी विजन में ठहरती ।
तनिक तुम ठहरकर सुनो गीत मेरा ।
कितना मधुर है सर-सर संगीत मेरा ।
दूर-दूर तक तुम नज़र अपनी डालो।
शीतलता को मेरी हृदय में बसा लो ।
सर-सर बहूँ मैं किंचित रुकना ना चाहूँ
चंचल पवन हूँ सबके मन को मैं भाऊं ।
सारा जहान मैं चुटकियों में घूम आऊं ।
मुदित मन से सदा मुलमुल मुस्कुराऊं ।
खेत-खलिहानों को मैंने सदा ही रिझाया।
सरसों की बालियों को हिंडोला झुलाया ।
मसूर की नन्ही फलियों को मैंने लुभाया।
कुसुमों को मुस्कुराना भी मैंने सिखाया ।
मेरे स्पर्श मात्र से झूमे तरुओं की डाली ।
तरु पात मिलकर बजाते हैं अजब ताली ।
उड़ाती हूँ मैं गोरी की लट काली-काली।
बयार हूँ बसंती सब ऋतुओं से निराली।
-कमला बिष्ट ‘कमल’
अल्मोड़ा उत्तराखंड


