
जिसने देखा है आभाव की मंजर
जिसने देखा है दुःखों का आसमान
उनसे जाकर कभी पूछ ही लेना
क्या होती है गरीबी की बेरहम जहान
कभी भूख ने तड़पाया है ये तन मन को
कभी गम ने रूलाया है जार जार
कभी ठंड की ठिठुरन ने रूलाया है
कभी महाजन की डाँट व फटकार
रो रो कर गुजारा है वो दिन सावन के
जब टपकता था पर्णकुटी से वर्षा की फुहार
पड़ोसी के घर पकता था मालपुआ
अपने घर ना था पेट भरने को ज्वार
आँखों में बसा था रंगमहल की सपना
पर दूर से ही चिढ़ाता था गाँव जवार
ढुँढ् ढुँढ कर थक गई थी दो आँखें
फिर भी ना मिला था अपनों का यार
कैसी कैसी व्यंग तीर चुभे थे मन में
कैसी थी पीड़ा का वो भारी भरकम पहाड़
क्यूं जन्म दी है गरीबी की ये जीवन
क्यूं दी है प्रभु ये आभाव का जालिम संसार
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




