
जिंदगी वहां तक नहीं, जहां तक हमारे कदम चले।
जिंदगी वहां पर भी है, जहां आकर हमारे कदम ठहर गए।
चलते-चलते यदि थक गए हो, तो कुछ पल विश्राम कर लो।
जीवन की छोटी-छोटी परीक्षाओं को, धैर्य से पार कर लो।
क्या उन दीवारों के पीछे भी, झांककर कभी देखा है—
जहां कोई अपना नहीं, सिर्फ सांसें साथ चलती हैं।
जब कदम बढ़ाओ आगे, तो उन झोपड़ियों की ओर भी जाना—
जहां निवाला तो है, पर ओढ़ने को चादर नहीं है।
अपनी खुशियों की दौड़ में, चलते-चलते थक जाओगे।
स्थायी आनंद की चाह हो यदि, तो अर्पण और समर्पण अपनाकर देखो।
ऋतु गर्ग,सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल
स्वरचित मौलिक रचना




