साहित्य

कैसे मैं नववर्ष मनाऊं

डॉ.उदयराज मिश्र

कैसे मैं नववर्ष मनाऊं?
कहाँ चैत्र प्रतिपदा अभी है?
कहाँ बसंती गीत सुनाऊं?
कैसे मैं नववर्ष मनाऊं?

शीत घने कोहरे से सिकुड़ी,
घर आंगन फुलवारी।
सूर्यदेव का दर्शन दुर्लभ,
व्याकुल जनता सारी।।
आखिर कौन खुशी ऐसी है?
जिसपर यूँ इतराऊं।।
कैसे मैं नववर्ष मनाऊं।?

जब कोकिल कूजेगी कू कू,
महंकेगी अमराई।
हरी भरी खेती लहकेगी,
यौवन सी इतराई।।
प्रमुदित कृषकों सँगसँग मैं भी-
गीत बसंती हँस हँस गाऊं।
हां हां तब नववर्ष मनाऊं।

अभी सियासत की ज्वाला से-
धधक रही फुलवारी।
गांव गली में घूम रहे हैं,
वोटों के पटवारी।।
कहाँ खुशी का दौर है आया,
और कहाँ क्या गाऊं?
कैसे मैं नववर्ष मनाऊं?

सत्य सनातन संस्कृति अपनी,
उसको ऐसा भूले।
अंग्रेजों की गोंद पले यूँ-
सँग उन्हीं के झूले।।
कागज के क्रिसमस ट्री पर,
क्यों गुलाब बिखराउं?
कैसे मैं नववर्ष मनाऊं?

– डॉ.उदयराज मिश्र
नेशनल अवार्डी शिक्षक
9453433900

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